B.A 2 Year 3rd Semester Political Science Unit-4 Important Questions
Question (1) भारतीय चुनाव आयोग के संगठन और कार्यों की व्याख्या कीजिए।
Answer :-
भारतीय चुनाव आयोग के संगठन और कार्यों की व्याख्या
भारतीय चुनाव आयोग (Election Commission of India) भारत के चुनावों को स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से संपन्न कराने वाला संवैधानिक संस्था है। इसका गठन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत किया गया है।
1. संगठन (Organization of Election Commission)
(क) संवैधानिक प्रावधान:
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चुनाव आयोग की स्थापना अनुच्छेद 324 के तहत होती है।
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यह एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है।
(ख) रचना (Composition):
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चुनाव आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner - CEC) और दो या तीन अन्य चुनाव आयुक्त (Election Commissioners) हो सकते हैं।
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वर्तमान में चुनाव आयोग में कुल 3 सदस्य होते हैं (1 मुख्य चुनाव आयुक्त + 2 चुनाव आयुक्त)।
(ग) नियुक्ति (Appointment):
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चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
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उनकी सेवा की अवधि सामान्यतः 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक होती है, जो भी पहले हो।
(घ) स्वतंत्रता और सुरक्षा:
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मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना लगभग न्यायाधीश के हटाने के समान कड़ी प्रक्रिया से होकर जाता है।
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चुनाव आयुक्तों को स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार है।
2. चुनाव आयोग के कार्य (Functions of Election Commission)
(1) चुनाव का संचालन (Conducting Elections):
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भारत के संसद, राज्य विधानसभाओं और राष्ट्रपति/ उपराष्ट्रपति चुनावों का आयोजन।
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चुनावों को स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाना।
(2) मतदाता सूची का निर्माण और रख-रखाव (Preparation and Updating of Electoral Rolls):
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मतदाता सूची तैयार करना, उसे नियमित अपडेट करना।
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नए मतदाताओं का पंजीकरण करना और अनावश्यक नाम हटाना।
(3) चुनावी नियम और कानून बनाना (Framing Electoral Rules):
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चुनाव संबंधी नियम, दिशा-निर्देश और मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट (Model Code of Conduct) बनाना और लागू करना।
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राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए आचार संहिता लागू करना।
(4) चुनाव खर्च और वित्तीय निगरानी (Monitoring Election Expenditure):
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उम्मीदवारों और पार्टियों के चुनाव खर्च की निगरानी।
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अनियमित खर्च की जांच और कार्रवाई करना।
(5) चुनाव संबंधित विवादों का निपटारा (Resolving Election Disputes):
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चुनाव प्रक्रिया में आने वाली अनियमितताओं की जांच।
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चुनाव रद्द करने या परिणामों को चुनौती देने के मामलों में सलाह देना।
(6) राजनीतिक दलों का पंजीकरण (Registration of Political Parties):
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राजनीतिक दलों को पंजीकृत करना और उनके चुनाव चिह्न आवंटित करना।
(7) चुनावी शिक्षा और जागरूकता (Voter Education and Awareness):
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मतदाताओं को मतदान के महत्व और प्रक्रिया के बारे में जागरूक करना।
3. चुनाव आयोग की विशेष भूमिका (Special Role of Election Commission):
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चुनाव आयोग चुनाव प्रक्रिया को लोकतंत्र की रीढ़ मानता है।
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देश में चुनावों के दौरान राजनीतिक दबावों से स्वतंत्रता बनाए रखता है।
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विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चुनाव समय पर और सुचारू रूप से करवाता है।
4. चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और चुनौतियाँ (Independence and Challenges):
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चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष बनाए रखने के लिए संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त है।
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फिर भी राजनीतिक दबाव, नकली मतदाता, धनबल, और चुनाव हिंसा जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
5. निष्कर्ष:
भारतीय चुनाव आयोग भारतीय लोकतंत्र का संरक्षक है। यह सुनिश्चित करता है कि चुनाव प्रक्रिया लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप हो और सभी नागरिकों को समान अवसर मिले। इसकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है।
Question (2) भारत में चुनावी प्रक्रिया की कमज़ोरियाँ क्या हैं? उन्हें दूर करने के सुझाव दीजिए।
Answer :-
भारत में चुनावी प्रक्रिया लोकतंत्र की रीढ़ मानी जाती है। यह दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक प्रक्रिया है जहाँ करोड़ों नागरिक अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं। लेकिन, इतनी विशाल प्रणाली में कई कमज़ोरियाँ भी हैं, जो इसके निष्पक्ष और पारदर्शी संचालन में बाधा डालती हैं।
🔴 भारत में चुनावी प्रक्रिया की कमज़ोरियाँ (Detailed Weaknesses):
1. धनबल और बाहुबल का प्रभाव
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कई उम्मीदवार चुनाव जीतने के लिए भारी मात्रा में काले धन का उपयोग करते हैं।
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मतदाताओं को पैसे, शराब, और उपहार देकर प्रभावित किया जाता है।
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बाहुबल (muscle power) के ज़रिए मतदाताओं और प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों को डराया-धमकाया जाता है।
2. राजनीति का अपराधीकरण (Criminalization of Politics)
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बड़ी संख्या में ऐसे उम्मीदवार चुनाव लड़ते हैं जिन पर गंभीर आपराधिक आरोप (बलात्कार, हत्या, भ्रष्टाचार) होते हैं।
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सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद राजनीतिक दल साफ-सुथरे छवि वाले उम्मीदवारों को टिकट नहीं देते।
3. जातिवाद और सांप्रदायिकता आधारित वोटिंग
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उम्मीदवार मतदाताओं को जाति, धर्म या क्षेत्र के आधार पर बाँटकर वोट मांगते हैं।
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इससे सामाजिक ताना-बाना और राष्ट्रीय एकता पर विपरीत असर पड़ता है।
4. वोटर जागरूकता और शिक्षा की कमी
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ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में कई मतदाता पढ़े-लिखे नहीं होते, जिससे वे उम्मीदवार के योग्यता की जांच नहीं कर पाते।
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कई लोग जाति, धर्म या पैसे के प्रभाव में आकर वोट डालते हैं।
5. ईवीएम और वीवीपैट पर संदेह
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कुछ राजनीतिक दलों और जनता के बीच ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर संदेह है।
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वीवीपैट स्लिप का मिलान सभी सीटों पर नहीं होता, जिससे पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं।
6. फर्जी वोटिंग और बूथ कैप्चरिंग
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कुछ क्षेत्रों में अब भी बूथ कैप्चरिंग और फर्जी वोटिंग जैसी घटनाएँ सामने आती हैं, विशेषकर कमजोर सुरक्षा वाले क्षेत्रों में।
7. चुनावी खर्च में पारदर्शिता की कमी
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कानूनन चुनाव खर्च की सीमा तय है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में उम्मीदवार कई गुना ज़्यादा खर्च करते हैं।
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फंडिंग का स्रोत अक्सर अस्पष्ट होता है, जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।
8. वोटर टर्नआउट में असमानता
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शहरी इलाकों में शिक्षित नागरिक भी वोट डालने नहीं जाते, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत अपेक्षाकृत अधिक होता है।
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इससे परिणाम असंतुलित हो सकते हैं।
🟢 कमज़ोरियों को दूर करने के सुझाव (Detailed Reforms):
1. राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता लाना
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चुनाव आयोग द्वारा सभी राजनीतिक दलों को आय और व्यय का पूरा ब्योरा सार्वजनिक करना अनिवार्य किया जाए।
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चुनावी बॉन्ड जैसे विवादित तरीकों की जगह पारदर्शी और निगरानी योग्य फंडिंग सिस्टम लागू किया जाए।
2. आपराधिक छवि वाले नेताओं पर पाबंदी
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जिन उम्मीदवारों पर गंभीर आपराधिक आरोप हैं और जिनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, उन्हें चुनाव लड़ने से रोका जाए (चाहे सजा न हुई हो)।
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राजनीतिक दलों को अपने उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि की जानकारी वेबसाइट और चुनाव आयोग को देना अनिवार्य किया जाए।
3. चुनाव खर्च की निगरानी और दंड
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चुनाव आयोग द्वारा स्वतंत्र एजेंसियों से चुनाव खर्च का ऑडिट करवाया जाए।
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तय सीमा से अधिक खर्च पर उम्मीदवार की उम्मीदवारी रद्द होनी चाहिए।
4. ईवीएम और वीवीपैट में सुधार
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वीवीपैट स्लिप को हर मतदान केंद्र पर यादृच्छिक (random) रूप से 100% गिना जाए।
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चुनाव आयोग को तकनीकी पारदर्शिता बढ़ाने के लिए विशेषज्ञों की स्वतंत्र टीमों से जांच करवानी चाहिए।
5. शिक्षा और जागरूकता अभियान
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विद्यालयों, कॉलेजों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से वोट देने की प्रक्रिया और उसके महत्व की शिक्षा दी जाए।
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चुनावों के समय विशेष अभियान चलाकर नागरिकों को सचेत किया जाए कि वे बिना किसी लालच के सही उम्मीदवार को वोट दें।
6. बायोमेट्रिक वोटिंग प्रणाली का विकास
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आधार कार्ड से वोटर ID को लिंक करके बायोमेट्रिक सिस्टम लागू किया जा सकता है, जिससे फर्जी वोटिंग पर रोक लगेगी।
7. "राइट टू रिकॉल" का प्रावधान
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यदि कोई निर्वाचित प्रतिनिधि जनहित में कार्य नहीं करता है, तो जनता को उसे वापस बुलाने का अधिकार मिलना चाहिए।
8. "वन नेशन, वन इलेक्शन" पर विचार
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बार-बार चुनावों से खर्च, प्रशासनिक बोझ और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है। एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने से संसाधनों की बचत हो सकती है।
✅ निष्कर्ष (Conclusion):
भारत की चुनावी प्रक्रिया में कई कमियाँ हैं, लेकिन इन्हें दूर करना असंभव नहीं है। यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति, कानून का सख्त पालन, और मतदाताओं की जागरूकता तीनों मिलकर काम करें, तो चुनावों को निष्पक्ष, पारदर्शी और सशक्त बनाया जा सकता है।
लोकतंत्र की सफलता केवल मतदान तक सीमित नहीं है — यह इस बात पर भी निर्भर करती है कि हम किस तरह के प्रतिनिधि चुनते हैं और कितनी सजगता से अपने अधिकारों और कर्तव्यों का पालन करते हैं।
Question (3) भारतीय चुनाव प्रणाली में किए गए चुनाव सुधारों का वर्णन कीजिए।
Answer :-
भारत की चुनाव प्रणाली समय-समय पर कई सुधारों से गुज़री है ताकि इसे अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और लोकतांत्रिक बनाया जा सके। इन सुधारों का उद्देश्य मतदाताओं का विश्वास बढ़ाना, धनबल व बाहुबल पर नियंत्रण पाना और राजनीति में ईमानदारी को प्रोत्साहित करना रहा है।
✅ भारतीय चुनाव प्रणाली में किए गए प्रमुख चुनाव सुधार
1. 🗳️ मतदान की न्यूनतम आयु में परिवर्तन (1989)
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पहले भारत में वोट देने की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष थी।
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1989 में 61वें संविधान संशोधन द्वारा इसे घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया, जिससे युवाओं को लोकतंत्र में भागीदारी का अधिकार मिला।
2. 💰 चुनाव खर्च पर नियंत्रण
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प्रत्येक उम्मीदवार के लिए चुनाव खर्च की अधिकतम सीमा तय की गई है।
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उम्मीदवारों को अपने खर्च का ब्यौरा चुनाव आयोग को देना होता है।
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यदि कोई उम्मीदवार तय सीमा से अधिक खर्च करता है या जानकारी नहीं देता, तो उसकी उम्मीदवारी रद्द की जा सकती है।
3. 🙅♂️ NOTA (None of the Above) विकल्प (2013)
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2013 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद EVM में NOTA बटन जोड़ा गया।
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इससे मतदाताओं को यह अधिकार मिला कि वे यदि किसी भी उम्मीदवार को उपयुक्त नहीं मानते, तो “कोई नहीं” को चुन सकें।
4. 👨⚖️ आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों का खुलासा (2003–2020)
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सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ऐसे उम्मीदवारों को, जिन पर आपराधिक मुकदमे हैं, अपनी जानकारी नामांकन पत्र के साथ देनी होती है।
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राजनीतिक दलों को भी यह बताना अनिवार्य है कि उन्होंने ऐसे उम्मीदवार को टिकट क्यों दिया।
5. 📢 चुनाव के दौरान आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct)
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चुनावों के दौरान चुनाव आयोग द्वारा एक आचार संहिता लागू की जाती है ताकि सत्ता में बैठे दल चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित न करें।
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यह संहिता सभी राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए समान रूप से लागू होती है।
6. 💳 EPIC (Electors Photo Identity Card) – मतदाता पहचान पत्र
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चुनावों में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए 1993 से EPIC कार्ड जारी किया गया।
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इससे फर्जी मतदान में कमी आई और मतदान प्रक्रिया अधिक विश्वसनीय बनी।
7. ⚖️ EVM (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) का प्रयोग
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पहली बार 1982 में प्रयोग, और फिर 2000 के बाद देशभर में पूर्ण रूप से लागू।
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इससे बैलेट पेपर की धोखाधड़ी पर रोक लगी और परिणाम जल्दी मिलने लगे।
8. 📄 VVPAT (Voter Verified Paper Audit Trail) प्रणाली
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2013 के बाद से VVPAT को EVM के साथ जोड़ा गया ताकि मतदाता यह देख सके कि उसका वोट सही व्यक्ति को गया या नहीं।
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इससे पारदर्शिता और विश्वास दोनों में वृद्धि हुई।
9. 🧾 चुनावी घोषणापत्र में वादों की वैधता पर निगरानी
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सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों द्वारा किए जा रहे लोकलुभावन वादों पर निगरानी रखने की दिशा में कदम उठाए हैं।
10. 📢 चुनावी फंडिंग सुधार – चुनावी बॉन्ड (2018)
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चुनावी फंडिंग को पारदर्शी बनाने के लिए चुनावी बॉन्ड लाए गए, लेकिन इस पर विवाद भी हुआ क्योंकि दानदाता की पहचान गुप्त रहती है।
11. 🎓 मतदाता जागरूकता अभियान – SVEEP (Systematic Voters’ Education and Electoral Participation)
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चुनाव आयोग द्वारा SVEEP कार्यक्रम के तहत मतदाताओं को जागरूक किया जाता है कि वे अपने वोट का सही प्रयोग करें।
12. 🧍♂️🧍♀️ लिंग, जाति और विकलांगता आधारित समानता
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चुनाव आयोग ने यह सुनिश्चित किया है कि विकलांग, बुज़ुर्ग और महिलाओं को मतदान केंद्रों पर सुविधा मिले।
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विशेष रैंप, व्हीलचेयर, और हेल्पलाइन सेवाएं उपलब्ध करवाई गई हैं।
📝 निष्कर्ष:
भारतीय चुनाव प्रणाली में समय-समय पर किए गए ये सुधार लोकतंत्र को मजबूत बनाने की दिशा में अहम कदम हैं। हालांकि, अब भी कई सुधारों की आवश्यकता है जैसे कि राजनीति से अपराधीकरण को पूरी तरह खत्म करना, चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता और डिजिटल वोटिंग की सुरक्षा।
एक सशक्त लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है कि मतदाता और नेता, दोनों ही जिम्मेदारी से अपना कर्तव्य निभाएँ।
