Centre States Relations (केंद्र राज्य संबंध)
Question (1) भारत में केंद्र और राज्यों के बीच विधायी संबंधों को लिखें।
Answer :-
भारत में केंद्र और राज्यों के बीच विधायी संबंध (Legislative Relations) संविधान द्वारा स्पष्ट रूप से निर्धारित किए गए हैं। इन संबंधों का उद्देश्य संघीय ढांचे को मज़बूती देना, शक्तियों का संतुलन बनाए रखना, और केंद्र तथा राज्यों के बीच समन्वय स्थापित करना है।
भारतीय संविधान में अनुच्छेद 245 से 255 तक केंद्र और राज्यों के विधायी संबंधों को वर्णित किया गया है। इनका विस्तार निम्नलिखित है:
✅ भारत में केंद्र और राज्यों के बीच विधायी संबंध
🔹 1. विषयों का विभाजन (Distribution of Subjects)
भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची (Seventh Schedule) में विधायी विषयों को तीन सूचियों में बाँटा गया है:
🟢 (a) संघ सूची (Union List):
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इसमें 97 विषय हैं (अब 100 से अधिक), जैसे – रक्षा, विदेश नीति, रेलवे, परमाणु ऊर्जा, मुद्रा आदि।
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केवल संसद (केंद्र) को इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है।
🔵 (b) राज्य सूची (State List):
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इसमें 66 विषय हैं (अब घटकर 61 के आसपास), जैसे – पुलिस, जेल, लोक स्वास्थ्य, कृषि, स्थानीय सरकार आदि।
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केवल राज्य विधानसभाएं इन विषयों पर कानून बना सकती हैं।
🟠 (c) समवर्ती सूची (Concurrent List):
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इसमें 47 विषय हैं (अब 52), जैसे – शिक्षा, विवाह-विवाह विच्छेद, वन, श्रम कानून आदि।
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केंद्र और राज्य दोनों इस पर कानून बना सकते हैं।
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लेकिन यदि दोनों का कानून टकराता है, तो केंद्र का कानून प्रभावी होता है (अनुच्छेद 254)।
🔹 2. विधायी अधिकार क्षेत्र (Territorial Jurisdiction)
👉 अनुच्छेद 245:
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संसद पूरे भारत में कानून बना सकती है।
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राज्य विधानसभाएं केवल अपने राज्य की सीमा में ही कानून बना सकती हैं।
🔹 3. कुछ विशेष परिस्थितियाँ जिनमें संसद को राज्य सूची पर कानून बनाने का अधिकार मिल जाता है:
✅ (a) राज्य की सहमति से (अनुच्छेद 252):
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यदि दो या दो से अधिक राज्य संसद से निवेदन करें, तो संसद उन विषयों पर कानून बना सकती है जो सामान्यतः राज्य सूची में आते हैं।
✅ (b) राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 250):
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राष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति में संसद को राज्य सूची पर भी कानून बनाने का अधिकार मिल जाता है।
✅ (c) राज्यसभा का प्रस्ताव (अनुच्छेद 249):
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यदि राज्यसभा में 2/3 बहुमत से यह घोषित किया जाए कि किसी राज्य विषय पर कानून बनाना राष्ट्रीय हित में है, तो संसद उस विषय पर कानून बना सकती है।
✅ (d) राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356):
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जब किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो, तो संसद उस राज्य की विधानसभाओं की भूमिका निभा सकती है।
🔹 4. विधायिका के अधीन प्रशासनिक नियंत्रण
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संसद राज्यों को दिशा-निर्देश दे सकती है कि वे कुछ कानूनों को किस प्रकार लागू करें।
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संसद द्वारा बनाए गए कानूनों को लागू करने में राज्यों की भूमिका होती है।
📌 न्यायिक दृष्टिकोण से व्याख्या
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केशवानंद भारती केस (1973) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र-राज्य संबंधों में संतुलन होना चाहिए ताकि संघीय ढाँचा बना रहे।
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सरकारिया आयोग (1983) और पंची आयोग (2007) ने सुझाव दिए कि राज्यों को अधिक विधायी स्वायत्तता दी जाए।
📝 निष्कर्ष (Conclusion):
भारत का संविधान एक "संघात्मक ढाँचा" (federal structure) प्रदान करता है, लेकिन उसमें केंद्रीय प्रवृत्ति (centralizing tendency) अधिक है। विधायी संबंधों में संतुलन बनाना आवश्यक है ताकि केंद्र और राज्य मिलकर देश के विकास और शासन को सुचारू रूप से चला सकें।
"वास्तविक लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब केंद्र और राज्य दोनों अपनी-अपनी विधायी शक्तियों का सम्मान करें और समन्वय से कार्य करें।"
Question (2) भारत में केंद्र और राज्यों के बीच प्रशासनिक संबंधों को लिखें
Answer :-
भारत में केंद्र और राज्यों के बीच प्रशासनिक संबंध (Administrative Relations) का उल्लेख भारतीय संविधान के भाग XI (अनुच्छेद 256 से 263) में किया गया है। ये संबंध स्पष्ट करते हैं कि भारत के संघात्मक ढाँचे में केंद्र और राज्य सरकारें प्रशासनिक कार्यों को कैसे विभाजित करती हैं और किस प्रकार परस्पर समन्वय बनाए रखती हैं।
✅ भारत में केंद्र और राज्यों के बीच प्रशासनिक संबंध
🔹 1. कार्य विभाजन का सिद्धांत (Distribution of Executive Power)
🟢 अनुच्छेद 162:
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राज्य सरकार को उस सीमा तक कार्यपालिका शक्ति प्राप्त होती है, जहाँ तक कि संसद द्वारा कानून न बना दिया गया हो।
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लेकिन जब कोई विषय केंद्र की शक्ति में आता है (जैसे संघ सूची), तो उस पर राज्य सरकार की शक्ति नहीं होती।
🟢 अनुच्छेद 73:
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केंद्र की कार्यपालिका शक्ति संसद के अधीन आने वाले विषयों तक सीमित होती है, लेकिन:
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यदि कोई विषय ऐसा है जो पूरे देश पर लागू होता है (जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा), तो केंद्र राज्य के क्षेत्र में भी हस्तक्षेप कर सकता है।
🔹 2. केंद्र द्वारा राज्यों को दिशा-निर्देश देने का अधिकार
🟡 अनुच्छेद 256:
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राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना होता है कि वे संसद द्वारा बनाए गए कानूनों को लागू करें।
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यदि आवश्यक हो, तो केंद्र राज्य को दिशा-निर्देश दे सकता है।
🟡 अनुच्छेद 257:
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राज्य सरकारें अपने कार्यों का निष्पादन इस प्रकार करें कि वह केंद्र सरकार के कार्यों में बाधा न बने।
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केंद्र सरकार यह निर्देश दे सकती है कि राज्य किस प्रकार से प्रशासनिक कार्य करे।
🔹 3. राज्यों में केंद्र की सहायता
🔵 अनुच्छेद 258:
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राष्ट्रपति, राज्य सरकार को कुछ केंद्र सरकार के कार्य सौंप सकता है, बशर्ते कि राज्य की सहमति हो।
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जैसे: पासपोर्ट जारी करना, जनगणना कराना आदि।
🔵 अनुच्छेद 258A:
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राज्य सरकार भी केंद्र को अपने कार्य सौंप सकती है (यह अनुच्छेद 1963 में जोड़ा गया)।
🔹 4. आपातकालीन स्थितियों में केंद्र की शक्ति
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आपातकाल के दौरान (अनुच्छेद 352, 356, 360), राज्य प्रशासन पर केंद्र का पूर्ण नियंत्रण हो जाता है।
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राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) में राज्य की कार्यपालिका शक्ति केंद्र के अधीन हो जाती है।
🔹 5. सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism)
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केंद्र और राज्य संयुक्त प्रयासों से योजनाओं और नीतियों को लागू करते हैं जैसे:
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नीति आयोग
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पंचवर्षीय योजनाएं (अब समाप्त)
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केंद्र प्रायोजित योजनाएं (Centrally Sponsored Schemes)
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🔹 6. अंतर-राज्यीय परिषद (Inter-State Council) – अनुच्छेद 263
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केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय और सहयोग बढ़ाने के लिए इस परिषद की स्थापना की गई।
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यह केंद्र और राज्यों, या राज्यों के बीच विवादों को सुलझाने में मदद करता है।
🔹 7. ऑल इंडिया सर्विसेज (All India Services)
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IAS, IPS, और IFS जैसी सेवाएँ केंद्र द्वारा नियुक्त की जाती हैं लेकिन ये अधिकारी राज्य सरकारों के अधीन काम करते हैं।
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इससे दोनों सरकारों के बीच प्रशासनिक समन्वय बना रहता है।
📌 सरकारिया आयोग (1983) के सुझाव:
सरकारिया आयोग ने केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंधों को बेहतर बनाने हेतु कई सुझाव दिए:
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केंद्र को राज्यों पर अनावश्यक नियंत्रण नहीं करना चाहिए।
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अनुच्छेद 356 का प्रयोग केवल अत्यंत आवश्यक परिस्थितियों में ही हो।
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अंतर-राज्यीय परिषद को अधिक प्रभावी बनाया जाए।
📝 निष्कर्ष (Conclusion):
भारतीय प्रशासनिक संबंधों की संरचना एक संतुलित संघात्मक व्यवस्था है, जिसमें केंद्र को अधिक शक्ति दी गई है, लेकिन यह भी सुनिश्चित किया गया है कि राज्यों को पर्याप्त स्वायत्तता मिल सके। सफल शासन और लोकतंत्र के लिए केंद्र और राज्य दोनों के बीच सहयोग, समन्वय और पारदर्शिता अत्यंत आवश्यक है।
"केंद्र और राज्य जब मिलकर कार्य करें, तभी राष्ट्र का समग्र विकास संभव है।"
Question (3) 3. भारत में केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों को लिखें।
Answer :-
भारत में केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंध भारतीय संविधान के भाग XII (अनुच्छेद 264 से 293) में वर्णित हैं। चूंकि भारत एक संघात्मक राष्ट्र है, इसलिए केंद्र और राज्यों दोनों के पास स्वतंत्र आर्थिक संसाधन और अधिकार हैं, लेकिन इनका वितरण असमान है। वित्तीय संबंधों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केंद्र और राज्य दोनों अपने-अपने दायित्वों को पूरा कर सकें।
✅ भारत में केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंध
🔹 1. राजस्व का वितरण (Distribution of Revenue)
भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार टैक्स लगाने के अधिकार तीन भागों में बाँटे गए हैं:
(a) केंद्र के कर लगाने के अधिकार (Union Taxes)
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आयकर (कॉरपोरेट टैक्स छोड़कर)
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सीमा शुल्क
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उत्पाद शुल्क (Excise duty)
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जीएसटी का केंद्रीय भाग
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सेवाकर (अब समाप्त)
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कॉर्पोरेट टैक्स
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उपकर (Surcharges)
(b) राज्यों के कर लगाने के अधिकार (State Taxes)
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संपत्ति कर
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वाहन कर
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शराब पर उत्पाद शुल्क
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स्टांप ड्यूटी
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बिजली शुल्क
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भूमि राजस्व
(c) समवर्ती कराधान (Shared Taxes)
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कुछ कर जैसे कि आयकर, GST, आदि, केंद्र द्वारा वसूले जाते हैं लेकिन राज्यों को भी उनका हिस्सा मिलता है।
🔹 2. वित्त आयोग (Finance Commission) – अनुच्छेद 280
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प्रत्येक 5 वर्ष में भारत का राष्ट्रपति वित्त आयोग का गठन करता है।
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यह आयोग केंद्र और राज्यों के बीच करों के वितरण की सिफारिश करता है।
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यह यह भी तय करता है कि राज्यों को केंद्र से अनुदान (Grants-in-aid) कैसे मिलें।
📌 15वाँ वित्त आयोग (2020-25):
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केंद्र को 41% कर राजस्व राज्यों को साझा करने की सिफारिश की।
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पिछड़े राज्यों के लिए विशेष अनुदान की व्यवस्था भी की गई।
🔹 3. केंद्र से राज्यों को अनुदान (Grants-in-Aid) – अनुच्छेद 275
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कुछ राज्यों को केंद्र सरकार द्वारा वित्तीय सहायता दी जाती है:
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पिछड़े क्षेत्रों के विकास के लिए
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प्राकृतिक आपदाओं के लिए
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विशेष योजनाओं के लिए
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🔹 4. केंद्र प्रायोजित योजनाएँ (Centrally Sponsored Schemes - CSS)
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इनमें केंद्र कुछ राशि देता है और राज्य कुछ भाग।
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उदाहरण:
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प्रधानमंत्री आवास योजना
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स्वच्छ भारत मिशन
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स्वास्थ्य मिशन (NHM)
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इन योजनाओं से राज्यों को केंद्र की नीतियों के अनुसार खर्च करना पड़ता है, जिससे कभी-कभी राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता पर प्रश्न उठते हैं।
🔹 5. उधारी और ऋण व्यवस्था – अनुच्छेद 293
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राज्य सरकारें उधारी ले सकती हैं, लेकिन यदि उन्होंने केंद्र सरकार से पहले ऋण लिया है और वह बकाया है, तो नई उधारी के लिए केंद्र की अनुमति अनिवार्य होती है।
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इससे केंद्र को राज्यों की वित्तीय गतिविधियों पर कुछ नियंत्रण प्राप्त होता है।
🔹 6. GST (वस्तु एवं सेवा कर) के बाद बदलाव
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GST (2017) लागू होने के बाद कई राज्य कर केंद्र के अधीन चले गए (जैसे: बिक्री कर)।
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राज्यों को नुकसान न हो, इसके लिए GST क्षतिपूर्ति अधिनियम लाया गया, जिसमें 5 वर्षों तक घाटे की भरपाई की गारंटी थी (2022 तक)।
📌 वित्तीय असंतुलन की समस्या
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राज्यों को अपने दायित्वों को निभाने के लिए जितना पैसा चाहिए, उतना वे स्वयं नहीं जुटा सकते।
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अधिकांश संसाधन केंद्र के पास होते हैं, इसलिए राज्यों को केंद्र पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे वित्तीय विषमता उत्पन्न होती है।
📝 निष्कर्ष (Conclusion):
भारत में केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंध एक जटिल लेकिन संतुलित प्रणाली है। संविधान ने इस ढांचे को इस तरह बनाया है कि केंद्र और राज्य दोनों मिलकर देश के आर्थिक विकास और प्रशासन को बेहतर बना सकें। हालांकि, राज्यों को अधिक वित्तीय स्वायत्तता और संसाधन देने की आवश्यकता है ताकि वे स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार योजनाएँ बना सकें।
"मजबूत राज्य, मजबूत संघ को जन्म देता है — इसलिए वित्तीय संतुलन और सहयोग दोनों आवश्यक हैं।"
Question (4) भारत में केंद्र और राज्यों के बीच तनाव के लिए जिम्मेदार कारकों को लिखिए।
Answer :-
भारत एक संघात्मक गणराज्य (Federal Republic) है, जहाँ केंद्र और राज्यों को संविधान द्वारा अलग-अलग शक्तियाँ सौंपी गई हैं। हालांकि, संविधान में संघात्मक संरचना होते हुए भी केंद्र को अपेक्षाकृत अधिक शक्तियाँ दी गई हैं। इस कारण समय-समय पर केंद्र और राज्यों के बीच तनाव उत्पन्न होता रहता है।
✅ भारत में केंद्र और राज्यों के बीच तनाव के लिए जिम्मेदार कारक
🔹 1. राजनीतिक मतभेद और दलगत राजनीति
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जब केंद्र और राज्य में अलग-अलग राजनीतिक दल सत्ता में होते हैं, तो टकराव की स्थिति पैदा होती है।
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राज्य सरकारें आरोप लगाती हैं कि केंद्र उनके साथ पक्षपात करता है या योजनाओं को रोके रखता है।
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विशेष रूप से विपक्ष शासित राज्यों को केंद्र की योजनाओं में पूर्ण सहयोग नहीं मिलता।
🔹 2. वित्तीय असंतुलन
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केंद्र के पास कर लगाने के ज्यादा अधिकार हैं, जबकि राज्यों की वित्तीय जरूरतें अधिक होती हैं।
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राज्यों को संसाधनों के लिए केंद्र पर निर्भर रहना पड़ता है।
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वित्त आयोग की सिफारिशें कभी-कभी राज्यों को असंतुष्ट करती हैं, विशेषकर दक्षिण भारतीय राज्य (जैसे तमिलनाडु, केरल) कम हिस्सेदारी का आरोप लगाते हैं।
🔹 3. राज्य सूची के विषयों में हस्तक्षेप
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केंद्र सरकार कई बार राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना देती है, जिससे राज्यों को लगता है कि उनकी स्वायत्तता में हस्तक्षेप हो रहा है।
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उदाहरण: शिक्षा पहले राज्य सूची में थी, अब समवर्ती सूची में है।
🔹 4. राज्यपाल की भूमिका
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राज्यपाल केंद्र द्वारा नियुक्त होता है, लेकिन वह राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है।
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अक्सर राज्यपाल राज्य सरकार की नीतियों को मंजूरी देने में देरी करते हैं या राजनीतिक रूप से केंद्र के हित में काम करते हैं।
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यह स्थिति राज्यों के लिए टकराव का विषय बन जाती है।
🔹 5. राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) का दुरुपयोग
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कई बार केंद्र सरकार ने राजनीतिक कारणों से राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू किया है।
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सुप्रीम कोर्ट ने SR बोंमई केस (1994) में इसकी सख्त समीक्षा करने की बात कही थी, लेकिन अभी भी इसका डर बना रहता है।
🔹 6. केंद्र प्रायोजित योजनाओं में राज्य की भागीदारी और नियंत्रण की कमी
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केंद्र सरकार राज्यों पर अपनी योजनाएँ थोपती है, जिनमें राज्य की ज़रूरतों और स्थानीय परिस्थियों का ध्यान नहीं रखा जाता।
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राज्यों को सीमित आर्थिक सहयोग मिलता है, लेकिन उन्हें योजनाओं को लागू करना पड़ता है।
🔹 7. विकेंद्रीकरण की कमी
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संविधान की 73वीं और 74वीं संशोधन के बाद स्थानीय स्वशासन को बढ़ावा मिला, लेकिन राज्यों को अब भी पर्याप्त स्वतंत्रता नहीं मिलती।
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केंद्र की नीतियाँ कई बार स्थानीय प्राथमिकताओं से मेल नहीं खातीं।
🔹 8. भाषा और संस्कृति संबंधी मुद्दे
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कुछ राज्यों में केंद्र द्वारा हिंदी को प्राथमिकता देने की नीतियों का विरोध होता है।
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जैसे: तमिलनाडु में हिंदी विरोध लंबे समय से एक बड़ा मुद्दा रहा है।
🔹 9. जासूसी और निगरानी के आरोप
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कुछ राज्य केंद्र पर जासूसी करने, फोन टैप करने या राजनीतिक विरोधियों को एजेंसियों के जरिए डराने का आरोप लगाते हैं।
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इससे भी विश्वास का संकट गहरा होता है।
📌 सम्बंधित उदाहरण:
| घटना/मुद्दा | संबंधित राज्य | कारण |
|---|---|---|
| कृषि कानून विवाद | पंजाब, हरियाणा, छत्तीसगढ़ | राज्य सूची में कानून बनाना केंद्र का हस्तक्षेप |
| गवर्नर बनाम राज्य सरकार | पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल | राज्यपाल की भूमिका को लेकर विवाद |
| जीएसटी क्षतिपूर्ति विवाद | सभी राज्य | राज्यों को समय पर भुगतान न मिलना |
📝 निष्कर्ष (Conclusion):
भारत में केंद्र और राज्यों के बीच संबंधों का संतुलन बनाए रखना संवैधानिक व्यवस्था की सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान में केंद्र के अधिक शक्तिशाली होने से राज्यों में असंतोष की भावना बढ़ रही है। इसलिए आवश्यक है कि संघीय ढांचे को मजबूत किया जाए, राज्यों को अधिक वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्तता दी जाए तथा राजनीतिक संवाद और सहमति के ज़रिए समस्याओं का समाधान किया जाए।
"संघीय भारत की ताक़त तभी टिकेगी जब केंद्र और राज्य परस्पर सहयोग और सम्मान के साथ काम करें।"
