B.A 2 Year 3rd Semester Political Science Unit-3 Important Questions
Question (1) राज्यपाल की नियुक्ति और शक्तियों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
Answer :-
राज्यपाल की नियुक्ति और शक्तियों का विस्तार से वर्णन भारतीय संविधान के भाग VI (अनुच्छेद 153 से 162) में किया गया है। राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख (Constitutional Head) होता है, जैसे राष्ट्रपति केंद्र का। यद्यपि वह नाममात्र का प्रमुख होता है, फिर भी उसके पास कुछ महत्त्वपूर्ण संवैधानिक शक्तियाँ होती हैं।
🔷 1. राज्यपाल की नियुक्ति (Appointment of Governor)
✅ (क) संवैधानिक प्रावधान:
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अनुच्छेद 153: प्रत्येक राज्य में एक राज्यपाल होगा।
-
अनुच्छेद 155: राज्यपाल की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
✅ (ख) पद की अवधि (Article 156):
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राज्यपाल 5 वर्षों के लिए नियुक्त होता है।
-
परंतु वह राष्ट्रपति की इच्छा पर कभी भी पद से हटाया जा सकता है — अर्थात्, वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त (At the pleasure of the President) पद धारण करता है।
✅ (ग) पात्रता (Qualifications) – अनुच्छेद 157:
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भारत का नागरिक होना चाहिए।
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उसकी आयु कम से कम 35 वर्ष होनी चाहिए।
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वह संसद या राज्य विधानसभा का सदस्य नहीं होना चाहिए।
-
लाभ के किसी पद पर आसीन नहीं होना चाहिए।
✅ (घ) न्युक्ति की प्रक्रिया:
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नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, परंतु वास्तव में यह केंद्र सरकार के निर्णय पर आधारित होती है।
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अक्सर राज्यपालों की नियुक्ति राजनीतिक परिस्थितियों से प्रभावित होती है।
🔷 2. राज्यपाल की शक्तियाँ (Powers of Governor)
राज्यपाल की शक्तियों को छह प्रमुख श्रेणियों में बाँटा जा सकता है:
✅ (1) कार्यपालिका शक्तियाँ (Executive Powers):
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राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होती है (अनुच्छेद 154)।
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राज्यपाल:
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मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है।
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मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों की नियुक्ति करता है, मुख्यमंत्री की सलाह पर।
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महाधिवक्ता (Advocate General), राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति करता है।
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राज्य प्रशासन का संचालन करता है, लेकिन मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करता है।
-
✅ (2) विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers):
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राज्यपाल राज्य की विधायिका का एक अंग होता है।
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उसकी विधायी शक्तियाँ इस प्रकार हैं:
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राज्य विधानसभा के सत्र बुलाना, स्थगित करना और भंग करना।
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विधानसभा को संबोधित करना और अभिभाषण देना।
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विधेयकों को assent (स्वीकृति) देना, रोकना, पुनर्विचार के लिए लौटाना या राष्ट्रपति के पास भेजना।
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आवश्यक होने पर अध्यादेश (Ordinance) जारी करना – अनुच्छेद 213।
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राज्य विधानमंडल में 1/6 सदस्य नामित कर सकता है (केवल द्विसदनीय राज्यों में, विधान परिषद के लिए)।
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✅ (3) वित्तीय शक्तियाँ (Financial Powers):
-
राज्य का बजट राज्यपाल की अनुमति से प्रस्तुत किया जाता है।
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बिना राज्यपाल की अनुमति के कोई वित्तीय विधेयक विधानसभा में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
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राज्यपाल राज्य के संविदानिक व्यय (Contingency Fund) का संरक्षक होता है।
✅ (4) न्यायिक शक्तियाँ (Judicial Powers):
-
राज्यपाल को कुछ न्यायिक शक्तियाँ प्राप्त हैं:
-
वह राज्य कानूनों के उल्लंघन में दोषी व्यक्तियों को क्षमा (Pardon), दंड में राहत, परिवर्तन, निलंबन आदि प्रदान कर सकता है (अनुच्छेद 161)।
-
लेकिन केवल राज्य कानूनों के अंतर्गत दिए गए दंडों के मामलों में ही।
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✅ (5) आपातकालीन शक्तियाँ / विशेष विवेकाधीन शक्तियाँ (Discretionary Powers):
-
सामान्यतः राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करता है, लेकिन कुछ स्थितियों में वह अपने विवेक का प्रयोग कर सकता है, जैसे:
-
मुख्यमंत्री की नियुक्ति जब स्पष्ट बहुमत न हो।
-
विधानसभा में बहुमत परीक्षण कराना।
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राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करना (अनुच्छेद 356)।
-
विधानमंडल को भंग करना या निलंबित करना।
-
आरक्षित विधेयक राष्ट्रपति को भेजना।
-
✅ (6) अन्य विशेष शक्तियाँ:
-
छोटे राज्यों (जैसे नागालैंड, मिज़ोरम आदि) में राज्यपाल को विशेष जिम्मेदारियाँ सौंपी जाती हैं — जैसे जनजातीय क्षेत्रों में शांति व व्यवस्था बनाए रखना।
🔷 3. राज्यपाल की भूमिका पर विवाद और आलोचना
❌ आलोचना के मुख्य बिंदु:
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राज्यपाल की नियुक्ति राजनीतिक हो जाती है।
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केंद्र सरकार द्वारा राज्यपाल का दुरुपयोग, विशेषतः विपक्षी शासित राज्यों में।
-
अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग कर राज्य सरकारें गिराई गईं।
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राज्यपाल का विवेकाधिकार कभी-कभी अलोकतांत्रिक रूप से प्रयुक्त होता है।
🏛 महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय:
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एस.आर. बोम्मई केस (1994): अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर नियंत्रण लगाया गया।
-
नबाम रेबिया केस (2016): राज्यपाल विधानसभा की कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं कर सकते।
🔷 4. निष्कर्ष (Conclusion):
राज्यपाल भारत के संवैधानिक संघवाद की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। वह एक ओर राज्य का प्रमुख होता है, वहीं दूसरी ओर केंद्र और राज्य के बीच सेतु की भूमिका निभाता है। परंतु जब राज्यपाल की भूमिका राजनीति से प्रेरित होती है, तो यह संविधान की आत्मा के विरुद्ध होता है।
✍️ समाधान: राज्यपाल की नियुक्ति में पारदर्शिता, गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि, और न्यायिक समीक्षा जैसे उपायों को अपनाना आवश्यक है।
Question (2) मुख्यमंत्री की नियुक्ति और शक्तियों का वर्णन कीजिए।
Answer :-
मुख्यमंत्री की नियुक्ति और शक्तियों का वर्णन भारतीय संविधान के भाग VI (अनुच्छेद 163 से 167) में किया गया है। मुख्यमंत्री राज्य में कार्यपालिका का वास्तविक प्रमुख (Real Executive Head) होता है, जैसे प्रधानमंत्री केंद्र में होता है। राज्यपाल केवल औपचारिक प्रमुख (Nominal Head) होता है, जबकि मुख्यमंत्री राज्य प्रशासन का नेतृत्व करता है।
🔷 1. मुख्यमंत्री की नियुक्ति (Appointment of Chief Minister)
✅ (क) संवैधानिक प्रावधान:
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अनुच्छेद 164(1): मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है।
अनुच्छेद 164(1): मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है।
✅ (ख) व्यवहारिक प्रक्रिया:
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विधानसभा चुनावों के बाद जो पार्टी (या गठबंधन) बहुमत प्राप्त करती है, उसके नेता को राज्यपाल मुख्यमंत्री नियुक्त करता है।
-
यदि स्पष्ट बहुमत नहीं हो, तो राज्यपाल:
-
सबसे बड़े दल या गठबंधन के नेता को आमंत्रित करता है।
-
बहुमत साबित करने का समय देता है।
-
मुख्यमंत्री बनने के लिए किसी व्यक्ति का राज्य विधानसभा का सदस्य होना आवश्यक है। यदि वह नहीं है, तो 6 महीने के भीतर निर्वाचित होना अनिवार्य है (अनुच्छेद 164(4))।
विधानसभा चुनावों के बाद जो पार्टी (या गठबंधन) बहुमत प्राप्त करती है, उसके नेता को राज्यपाल मुख्यमंत्री नियुक्त करता है।
यदि स्पष्ट बहुमत नहीं हो, तो राज्यपाल:
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सबसे बड़े दल या गठबंधन के नेता को आमंत्रित करता है।
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बहुमत साबित करने का समय देता है।
मुख्यमंत्री बनने के लिए किसी व्यक्ति का राज्य विधानसभा का सदस्य होना आवश्यक है। यदि वह नहीं है, तो 6 महीने के भीतर निर्वाचित होना अनिवार्य है (अनुच्छेद 164(4))।
🔶 2. मुख्यमंत्री की शक्तियाँ (Powers of the Chief Minister)
मुख्यमंत्री की शक्तियाँ छह प्रमुख वर्गों में विभाजित की जा सकती हैं:
✅ (1) कार्यपालिका शक्तियाँ (Executive Powers):
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मुख्यमंत्री राज्य सरकार का प्रमुख प्रशासक होता है।
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वह:
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राज्यपाल को मंत्रिपरिषद के निर्णयों की सूचना देता है (अनुच्छेद 167)।
-
मंत्रियों के कार्यविभाजन और समन्वय की जिम्मेदारी निभाता है।
-
मंत्रिपरिषद की बैठकें बुलाता है और अध्यक्षता करता है।
-
मंत्रियों की नियुक्ति में राज्यपाल को सलाह देता है।
मुख्यमंत्री राज्य सरकार का प्रमुख प्रशासक होता है।
वह:
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राज्यपाल को मंत्रिपरिषद के निर्णयों की सूचना देता है (अनुच्छेद 167)।
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मंत्रियों के कार्यविभाजन और समन्वय की जिम्मेदारी निभाता है।
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मंत्रिपरिषद की बैठकें बुलाता है और अध्यक्षता करता है।
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मंत्रियों की नियुक्ति में राज्यपाल को सलाह देता है।
✅ (2) विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers):
-
मुख्यमंत्री:
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विधानसभा सत्र बुलाने की राज्यपाल को सलाह देता है।
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विधानमंडल के अधिवेशन को संबोधित करता है और सरकार की नीतियाँ बताता है।
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विधानसभा में सरकार की नीतियों का प्रतिनिधित्व करता है।
-
विश्वास मत / अविश्वास प्रस्ताव का सामना करता है।
-
आवश्यक होने पर विधानसभा भंग करने की सिफारिश करता है।
मुख्यमंत्री:
-
विधानसभा सत्र बुलाने की राज्यपाल को सलाह देता है।
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विधानमंडल के अधिवेशन को संबोधित करता है और सरकार की नीतियाँ बताता है।
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विधानसभा में सरकार की नीतियों का प्रतिनिधित्व करता है।
-
विश्वास मत / अविश्वास प्रस्ताव का सामना करता है।
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आवश्यक होने पर विधानसभा भंग करने की सिफारिश करता है।
✅ (3) वित्तीय शक्तियाँ (Financial Powers):
-
बजट का प्रारूप मुख्यमंत्री और उसके मंत्रिमंडल द्वारा तैयार किया जाता है।
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विधानसभा में बजट प्रस्तुत करने की राजनीतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी मुख्यमंत्री की होती है।
बजट का प्रारूप मुख्यमंत्री और उसके मंत्रिमंडल द्वारा तैयार किया जाता है।
विधानसभा में बजट प्रस्तुत करने की राजनीतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी मुख्यमंत्री की होती है।
✅ (4) राजनीतिक शक्तियाँ (Political Powers):
-
मुख्यमंत्री अपनी पार्टी (या गठबंधन) का नेता होता है, इसलिए राजनीतिक दृष्टि से अत्यधिक प्रभावशाली होता है।
-
वह राज्य सरकार की छवि और नीति निर्धारण का मुख्य चेहरा होता है।
मुख्यमंत्री अपनी पार्टी (या गठबंधन) का नेता होता है, इसलिए राजनीतिक दृष्टि से अत्यधिक प्रभावशाली होता है।
वह राज्य सरकार की छवि और नीति निर्धारण का मुख्य चेहरा होता है।
✅ (5) राज्यपाल के साथ संबंध (Relation with Governor):
-
मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच समन्वय आवश्यक होता है।
-
राज्यपाल आमतौर पर मुख्यमंत्री की सलाह पर ही कार्य करता है, सिवाय कुछ विवेकाधीन स्थितियों के।
मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच समन्वय आवश्यक होता है।
राज्यपाल आमतौर पर मुख्यमंत्री की सलाह पर ही कार्य करता है, सिवाय कुछ विवेकाधीन स्थितियों के।
✅ (6) केंद्रीय सरकार से संबंध:
-
मुख्यमंत्री राज्य का प्रतिनिधित्व करता है और केंद्र के साथ नीतिगत संवाद का नेतृत्व करता है।
-
राष्ट्रीय विकास परिषद, NITI Aayog, Zonal Councils आदि में भाग लेता है।
मुख्यमंत्री राज्य का प्रतिनिधित्व करता है और केंद्र के साथ नीतिगत संवाद का नेतृत्व करता है।
राष्ट्रीय विकास परिषद, NITI Aayog, Zonal Councils आदि में भाग लेता है।
🔷 3. मुख्यमंत्री की भूमिका (Role of the Chief Minister)
| भूमिका | विवरण |
|---|---|
| शासकीय प्रमुख | प्रशासनिक निर्णयों का केंद्र |
| मंत्रिपरिषद का नेता | मंत्री नियुक्त करता है, समन्वय करता है |
| विधानसभा में नेता | नीतियों का प्रस्तोता और उत्तरदाता |
| केंद्र-राज्य संबंधों में सेतु | राज्य की ओर से केंद्र से संवाद करता है |
| जनता का प्रतिनिधि | राज्य की जनता की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है |
🔷 4. मुख्यमंत्री की उत्तरदायित्व (Responsibility of CM)
-
विधानसभा के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व।
-
जनता और पार्टी के प्रति राजनीतिक उत्तरदायित्व।
-
संवैधानिक मर्यादाओं और राज्यपाल की अपेक्षाओं के प्रति प्रशासनिक उत्तरदायित्व।
विधानसभा के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व।
जनता और पार्टी के प्रति राजनीतिक उत्तरदायित्व।
संवैधानिक मर्यादाओं और राज्यपाल की अपेक्षाओं के प्रति प्रशासनिक उत्तरदायित्व।
🔷 5. निष्कर्ष (Conclusion):
मुख्यमंत्री राज्य का वास्तविक शासक होता है। उसकी भूमिका केवल प्रशासनिक न होकर राजनीतिक, विधायी और सामाजिक नेतृत्व की भी होती है। राज्यपाल भले ही संवैधानिक प्रमुख हो, लेकिन राज्य सरकार की सफलता या असफलता मुख्यमंत्री पर निर्भर करती है।
✍️ अतः, मुख्यमंत्री को राज्य की शासन व्यवस्था का "केन्द्रीय धुरी" (Pivot of the State Government)" कहा जाता है।
Question (3) राज्य विधानसभा/राज्य परिषद के संगठन और शक्तियों की व्याख्या कीजिए।
Answer :-
राज्य विधानसभा और राज्य परिषद के संगठन और शक्तियों की व्याख्या
भारतीय संविधान के भाग VI (अनुच्छेद 168 से 212) में राज्य विधायिका की संरचना और शक्तियों का प्रावधान है। भारत में राज्यों में विधायिका एकल सदन या द्विसदनीय हो सकती है।
1. राज्य विधायिका का संगठन (Composition of State Legislature)
(क) एक सदन प्रणाली (Unicameral Legislature):
-
केवल राज्य विधानसभा (Legislative Assembly) होती है।
-
अधिकतर राज्यों में यह व्यवस्था है।
केवल राज्य विधानसभा (Legislative Assembly) होती है।
अधिकतर राज्यों में यह व्यवस्था है।
(ख) द्विसदनीय प्रणाली (Bicameral Legislature):
-
राज्य विधानसभा (Legislative Assembly - Vidhan Sabha) और
-
राज्य परिषद (Legislative Council - Vidhan Parishad) दोनों होते हैं।
-
भारत के कुछ राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, कर्नाटक, तेलंगाना, जम्मू-कश्मीर*) में यह व्यवस्था है।
-
*जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त हो चुका है, इसलिए वर्तमान में परिषद नहीं है।
राज्य विधानसभा (Legislative Assembly - Vidhan Sabha) और
राज्य परिषद (Legislative Council - Vidhan Parishad) दोनों होते हैं।
भारत के कुछ राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, कर्नाटक, तेलंगाना, जम्मू-कश्मीर*) में यह व्यवस्था है।
*जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त हो चुका है, इसलिए वर्तमान में परिषद नहीं है।
राज्य विधानसभा (Vidhan Sabha):
-
सदस्यों की संख्या:
-
न्यूनतम 60 और अधिकतम 500 सदस्यों तक हो सकती है।
-
सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष चुनाव से होता है।
-
सदस्य की न्यूनतम आयु: 25 वर्ष।
-
कार्यकाल: 5 वर्ष, लेकिन विधानसभा को पहले भंग किया जा सकता है।
-
राज्य विधानसभा का प्रमुख होता है सभापति (Speaker), जो सदस्यों में से चुना जाता है।
सदस्यों की संख्या:
-
न्यूनतम 60 और अधिकतम 500 सदस्यों तक हो सकती है।
-
सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष चुनाव से होता है।
सदस्य की न्यूनतम आयु: 25 वर्ष।
कार्यकाल: 5 वर्ष, लेकिन विधानसभा को पहले भंग किया जा सकता है।
राज्य विधानसभा का प्रमुख होता है सभापति (Speaker), जो सदस्यों में से चुना जाता है।
राज्य परिषद (Vidhan Parishad):
-
सदस्यों की संख्या:
-
राज्य विधानसभा के एक-तिहाई से अधिक नहीं।
-
कम से कम 40 सदस्य।
-
सदस्य होते हैं:
-
विधान सभा द्वारा निर्वाचित सदस्य,
-
स्थानीय निकायों से निर्वाचित,
-
राज्य के शैक्षणिक, व्यापारिक, सामाजिक क्षेत्रों के प्रतिनिधि,
-
राज्यपाल द्वारा नामित सदस्य।
-
सदस्य की न्यूनतम आयु: 30 वर्ष।
-
कार्यकाल: 6 वर्ष, 2 वर्ष पर एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं।
-
परिषद का प्रमुख होता है अध्यक्ष (Chairman)।
सदस्यों की संख्या:
-
राज्य विधानसभा के एक-तिहाई से अधिक नहीं।
-
कम से कम 40 सदस्य।
सदस्य होते हैं:
-
विधान सभा द्वारा निर्वाचित सदस्य,
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स्थानीय निकायों से निर्वाचित,
-
राज्य के शैक्षणिक, व्यापारिक, सामाजिक क्षेत्रों के प्रतिनिधि,
-
राज्यपाल द्वारा नामित सदस्य।
सदस्य की न्यूनतम आयु: 30 वर्ष।
कार्यकाल: 6 वर्ष, 2 वर्ष पर एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं।
परिषद का प्रमुख होता है अध्यक्ष (Chairman)।
2. राज्य विधायिका की शक्तियाँ (Powers of State Legislature)
राज्य विधायिका की शक्तियाँ तीन मुख्य प्रकार की होती हैं:
(1) विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers):
-
राज्य विधायिका निम्न विषयों पर कानून बना सकती है:
-
राज्य सूची (State List) के विषय।
-
समवर्ती सूची (Concurrent List) के विषय (जहाँ केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं)।
-
विधेयक पास करना, संशोधन करना और निरस्त करना।
-
वित्तीय विधेयक (राजस्व, बजट आदि) का पारित करना।
-
विधान परिषद के सदस्यों के लिए नियम बनाना (यदि परिषद है तो)।
राज्य विधायिका निम्न विषयों पर कानून बना सकती है:
-
राज्य सूची (State List) के विषय।
-
समवर्ती सूची (Concurrent List) के विषय (जहाँ केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं)।
विधेयक पास करना, संशोधन करना और निरस्त करना।
वित्तीय विधेयक (राजस्व, बजट आदि) का पारित करना।
विधान परिषद के सदस्यों के लिए नियम बनाना (यदि परिषद है तो)।
(2) वित्तीय शक्तियाँ (Financial Powers):
-
बजट पारित करना और राज्य सरकार के लिए धन उपलब्ध कराना।
-
कर लगाने, बढ़ाने या छूट देने का अधिकार।
-
राज्य निधि का प्रबंधन।
-
वित्तीय बिल राज्य विधानसभा में प्रस्तुत करना अनिवार्य होता है।
बजट पारित करना और राज्य सरकार के लिए धन उपलब्ध कराना।
कर लगाने, बढ़ाने या छूट देने का अधिकार।
राज्य निधि का प्रबंधन।
वित्तीय बिल राज्य विधानसभा में प्रस्तुत करना अनिवार्य होता है।
(3) नियंत्रणात्मक और जांच शक्तियाँ (Control and Oversight Powers):
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कार्यपालिका (राज्य सरकार) के ऊपर विधायिका का नियंत्रण।
-
प्रश्नकाल के दौरान मंत्रियों से सवाल पूछना।
-
कोई भी मंत्री सदन में अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करता है।
-
अविश्वास प्रस्ताव पारित कर सरकार को गिराना।
-
समिति के माध्यम से जांच और समीक्षा करना।
कार्यपालिका (राज्य सरकार) के ऊपर विधायिका का नियंत्रण।
प्रश्नकाल के दौरान मंत्रियों से सवाल पूछना।
कोई भी मंत्री सदन में अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करता है।
अविश्वास प्रस्ताव पारित कर सरकार को गिराना।
समिति के माध्यम से जांच और समीक्षा करना।
3. राज्य विधानसभा और राज्य परिषद की भूमिका में अंतर (Difference in Role of Assembly and Council):
| विषय | राज्य विधानसभा (Vidhan Sabha) | राज्य परिषद (Vidhan Parishad) |
|---|---|---|
| विधायी शक्ति | पूर्ण विधायी शक्ति (बजट सहित) | विधेयकों की समीक्षा और संशोधन की शक्ति |
| बजट | वित्तीय विधेयक पास कर सकती है | वित्तीय विधेयक को मंजूरी नहीं दे सकती |
| सदस्यता | सीधे जनता द्वारा निर्वाचित | निर्वाचित और नामांकित सदस्य |
| कार्यकाल | 5 वर्ष | 6 वर्ष, लगातार नवीनीकरण |
| सरकार का गठन | विधानसभा के बहुमत से मुख्यमंत्री नियुक्त | कोई सरकार नहीं बनाती |
4. विशेष प्रावधान:
-
यदि राज्य विधायिका द्विसदनीय है, तो वित्तीय विधेयक पहले विधानसभा में प्रस्तुत किया जाता है।
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परिषद वित्तीय विधेयक को केवल 14 दिनों के भीतर पास या खारिज कर सकती है, अन्यथा बिल विधानसभा के पास पास हो जाता है।
-
अन्य विधेयकों में परिषद 3 महीने के भीतर विचार करती है, नहीं तो विधानसभा विधेयक पारित कर सकती है।
यदि राज्य विधायिका द्विसदनीय है, तो वित्तीय विधेयक पहले विधानसभा में प्रस्तुत किया जाता है।
परिषद वित्तीय विधेयक को केवल 14 दिनों के भीतर पास या खारिज कर सकती है, अन्यथा बिल विधानसभा के पास पास हो जाता है।
अन्य विधेयकों में परिषद 3 महीने के भीतर विचार करती है, नहीं तो विधानसभा विधेयक पारित कर सकती है।
5. निष्कर्ष:
राज्य विधानसभा राज्य विधायिका का मुख्य अंग है जो जनता के प्रतिनिधियों से बनी होती है और सरकार का गठन करती है। राज्य परिषद की भूमिका अधिकतर पुनरावलोकन और सलाहकार की होती है। दोनों मिलकर राज्य के प्रशासन, कानून निर्माण, और वित्तीय नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
