B.A 2 Year 3rd Semester Political Science Unit-2 Important Questions

 B.A 2 Year 3rd Semester Political Science Unit-2 Important Questions 






Question (1) भारतीय संविधान की संघीय विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

Answer :-

भारतीय संविधान की संघीय विशेषताओं का वर्णन करते समय यह समझना आवश्यक है कि भारत एक संघीय व्यवस्था (Federal System) अपनाने वाला देश है, लेकिन इसकी संघीयता पारंपरिक संघीय देशों (जैसे अमेरिका) से थोड़ी अलग और विशेष प्रकार की है। भारतीय संविधान में संघात्मकता और एकात्मकता (Unity) का एक संतुलित मिश्रण देखने को मिलता है, जिसे अक्सर "कठोर संघ नहीं, बल्कि सहकारी संघ" कहा जाता है।


🔶 भारतीय संविधान की संघीय विशेषताएँ (Federal Features of the Indian Constitution)

भारत में संघीय व्यवस्था की पहचान निम्नलिखित विशेषताओं से होती है:


1. दोहरी शासन व्यवस्था (Dual Polity):

  • भारत में दो स्तर की सरकारें हैं:

    • केन्द्र सरकार (Union Government)

    • राज्य सरकारें (State Governments)

  • दोनों की अलग कार्यक्षेत्र और शक्तियाँ हैं जो संविधान द्वारा निर्धारित की गई हैं।


2. लिखित संविधान (Written Constitution):

  • भारत का संविधान एक विस्तृत और लिखित दस्तावेज है जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट बँटवारा किया गया है।

  • संविधान की अनुच्छेद 1 से 395 तक तथा 12 अनुसूचियाँ संघीय ढाँचे को स्पष्ट करती हैं।


3. शक्तियों का विभाजन (Division of Powers):

  • संविधान की सातवीं अनुसूची (7th Schedule) में शक्तियों का तीन भागों में बँटवारा किया गया है:

    • केंद्रीय सूची (Union List)

    • राज्य सूची (State List)

    • समवर्ती सूची (Concurrent List)

  • इससे केंद्र और राज्यों को अलग-अलग विषयों पर कानून बनाने की शक्ति मिलती है।


4. संविधान की सर्वोच्चता (Supremacy of the Constitution):

  • भारत में संविधान सर्वोच्च कानून है। केंद्र और राज्य दोनों संविधान के अधीन कार्य करते हैं।

  • किसी भी कानून का संविधान से विरोध होने पर उसे असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है।


5. संविधान की कठोरता (Rigidity of Constitution):

  • संघीय व्यवस्था को बनाए रखने के लिए संविधान को बदलना आसान नहीं है।

  • कुछ संशोधन केवल केंद्र और आधे राज्यों की मंजूरी से ही संभव होते हैं (अनुच्छेद 368)।


6. न्यायपालिका की स्वतंत्रता (Independent Judiciary):

  • भारत में एक स्वतंत्र न्यायपालिका है, जो संविधान की व्याख्या करती है और संघीय संतुलन बनाए रखने का कार्य करती है।

  • सुप्रीम कोर्ट संघीय विवादों का अंतिम निर्णायक होता है।


7. केंद्र और राज्य दोनों के पास कराधान और राजस्व के अधिकार (Bicameral Financial System):

  • केंद्र और राज्य दोनों को अलग-अलग स्रोतों से राजस्व एकत्र करने का अधिकार है।

  • वित्त आयोग द्वारा संसाधनों का वितरण निर्धारित किया जाता है।


🔷 विशेष टिप्पणी: “भारत एक 'अनूठा संघीय राज्य' (Quasi-Federal State) है”

भारत की संघीयता पारंपरिक संघीयताओं से अलग है क्योंकि:

🔹 1. भारत में केंद्र को अधिक शक्ति प्राप्त है (Strong Centre):

  • समवर्ती सूची में टकराव की स्थिति में केंद्रीय कानून को वरीयता

  • आपातकालीन परिस्थितियों में केंद्र को पूर्ण अधिकार मिल जाते हैं।

  • केंद्र को राज्यों के बटवारे, नामकरण, सीमांकन का अधिकार (अनुच्छेद 3) है, जो अमेरिका जैसे संघीय देशों में नहीं होता।

🔹 2. एकीकृत नागरिकता (Single Citizenship):

  • भारत में सभी नागरिकों के लिए एक ही नागरिकता है, चाहे वे किसी भी राज्य के निवासी हों।

🔹 3. एकीकृत न्यायिक व्यवस्था (Single Judiciary):

  • अमेरिका में संघीय और राज्य स्तर पर अलग-अलग न्यायालय हैं, लेकिन भारत में एकीकृत न्यायपालिका प्रणाली है।


न्यायिक दृष्टिकोण (Judicial Interpretation):

🏛 केशवानंद भारती केस (1973):

  • सुप्रीम कोर्ट ने संघीय ढाँचे को संविधान के मूल ढाँचे (Basic Structure) का भाग माना।

🏛 एस. आर. बोम्मई केस (1994):

  • संघीयता को संविधान की मूल विशेषता घोषित किया गया, और केंद्र द्वारा अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग रोका गया।


🔶 निष्कर्ष (Conclusion):

भारतीय संविधान में स्पष्ट संघीय विशेषताएँ हैं, जैसे दोहरी सरकार, शक्तियों का विभाजन, स्वतंत्र न्यायपालिका आदि। परंतु यह संघीयता कठोर नहीं, बल्कि लचीली और व्यावहारिक है।

इसलिए भारत को अक्सर एक "संघात्मक शासन प्रणाली वाला एकात्मक राष्ट्र" (Federal System with Unitary Bias) कहा जाता है।

या फिर,

“भारत एक अद्वितीय संघीय मॉडल है जो संघात्मकता और एकात्मकता दोनों का समावेश करता है।”





Question (2) केंद्र-राज्य संबंधों की विस्तार से व्याख्या कीजिए।

Answer :-

भारतीय संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच संबंधों (Centre-State Relations) की व्यवस्था इस प्रकार की गई है कि यह एक संघीय ढांचे की भावना को बनाए रखते हुए राष्ट्रीय एकता और प्रभावी शासन सुनिश्चित कर सके।
हालांकि भारत एक संघीय राज्य (Federal State) है, फिर भी इसकी संघीयता में "एकात्मक झुकाव" (Unitary Bias) स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।


🔷 केंद्र-राज्य संबंधों की श्रेणियाँ (Types of Centre-State Relations):

भारतीय संविधान में केंद्र और राज्यों के संबंधों को तीन प्रमुख श्रेणियों में बाँटा गया है:

श्रेणी संबंधित अनुच्छेद                              क्या समाहित है
1. विधायी संबंध           अनुच्छेद 245 से 255                                     कानून बनाने की शक्ति
2. प्रशासनिक संबंध            अनुच्छेद 256 से 263                              शासन चलाने की जिम्मेदारियाँ
3. वित्तीय संबंध              अनुच्छेद 264 से 293                             राजस्व व संसाधनों का बँटवारा

अब आइए इन तीनों को विस्तार से समझें:


🔶 1. विधायी संबंध (Legislative Relations)

✅ (क) शक्तियों का विभाजन – सातवीं अनुसूची:

सातवीं अनुसूची में तीन सूचियाँ हैं:

सूची विषयों की संख्या किसे अधिकार
केंद्रीय सूची (Union List)     ~100 केवल संसद को
राज्य सूची (State List)      ~61 केवल राज्य विधानमंडल को
समवर्ती सूची (Concurrent List)      ~52 दोनों को (टकराव होने पर केंद्रीय कानून प्रभावी होगा)

✅ (ख) विशेष परिस्थितियाँ जिनमें केंद्र को अधिक शक्ति मिलती है:

  1. राष्ट्रपति शासन (Art. 356): संसद राज्य सूची पर भी कानून बना सकती है।

  2. राज्यसभा का संकल्प (Art. 249): यदि राष्ट्रीय हित में हो तो संसद राज्य सूची पर कानून बना सकती है।

  3. दो या दो से अधिक राज्यों का अनुरोध (Art. 252): संसद संबंधित राज्यों के लिए कानून बना सकती है।

  4. आपातकाल के दौरान (Art. 250): संसद को राज्य विषयों पर भी अधिकार मिल जाता है।


🔶 2. प्रशासनिक संबंध (Administrative Relations)

✅ (क) सामान्य प्रशासनिक नियंत्रण:

  • अनुच्छेद 256: राज्य कार्यपालिका को केंद्र के कानूनों का पालन करना अनिवार्य है।

  • अनुच्छेद 257: राज्य सरकारें केंद्र के नियंत्रण में कार्य करेंगी यदि राष्ट्रीय हित में हो।

✅ (ख) केन्द्र की सहायता की व्यवस्था:

  • केंद्र, राज्य को प्रशासनिक सहायता और मार्गदर्शन दे सकता है।

  • केंद्र द्वारा नियुक्त राज्यपाल, केंद्र और राज्य के बीच सेतु की भूमिका निभाता है।

✅ (ग) अखिल भारतीय सेवाएँ (All India Services):

  • IAS, IPS जैसी सेवाएँ केंद्र और राज्य दोनों के अधीन कार्य करती हैं।

  • यह व्यवस्था केंद्र को राज्यों के प्रशासन पर प्रभाव रखने में मदद करती है।

✅ (घ) अंतराज्यीय परिषद (Inter-State Council):

  • अनुच्छेद 263 के तहत राज्यों के बीच समन्वय के लिए।

  • सर्वोच्च सलाहकार निकाय, परंतु इसके निर्णय बाध्यकारी नहीं होते।


🔶 3. वित्तीय संबंध (Financial Relations)

✅ (क) कर लगाने की शक्तियों का विभाजन:

अनुच्छेद 268 से 293 के तहत:

  • कुछ कर केवल केंद्र लगा सकता है (जैसे आयकर, सीमा शुल्क)।

  • कुछ कर राज्य लगा सकते हैं (जैसे भूमि राजस्व, आबकारी)।

  • कुछ कर साझा किए जाते हैं (जैसे GST)।

✅ (ख) वित्त आयोग (Finance Commission) – अनुच्छेद 280:

  • यह आयोग हर 5 साल में गठित होता है।

  • केंद्र और राज्यों के बीच करों के बँटवारे की सिफारिश करता है।

✅ (ग) अनुदान (Grants-in-aid):

  • राज्यों को केंद्र से सहायता देने की व्यवस्था की गई है।

  • इसमें सामान्य और विशेष सहायता शामिल होती है।

✅ (घ) GST प्रणाली:

  • GST एक संयुक्त कर प्रणाली है।

  • केंद्र और राज्यों दोनों को अधिकार है, और एक GST परिषद (GST Council) के माध्यम से निर्णय लिए जाते हैं।


🔶 4. आपातकाल में केंद्र-राज्य संबंधों में बदलाव

आपातकाल केंद्र की शक्ति
राष्ट्रीय आपातकाल (Art. 352)              राज्य विषयों पर भी कानून बना सकता है
राष्ट्रपति शासन (Art. 356)            राज्य की कार्यपालिका और विधायिका केंद्र के अधीन
वित्तीय आपातकाल (Art. 360)                      राज्य की वित्तीय स्वतंत्रता सीमित

🔶 5. व्यवहारिक पक्ष व चुनौतियाँ (Challenges in Centre-State Relations)

  • राज्यपाल की भूमिका: कभी-कभी राज्यपाल का कार्य राजनीतिक रूप से पक्षपातपूर्ण माना जाता है।

  • राज्यों की राजस्व पर निर्भरता: केंद्र पर अत्यधिक आर्थिक निर्भरता राज्यों को कमजोर बनाती है।

  • केंद्र द्वारा अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग: अतीत में राजनीतिक कारणों से राज्यों की सरकारें गिराई गईं।

  • क्षेत्रीय असंतुलन और असंतोष: राज्यों में यह भावना रही है कि केंद्र उन्हें नजरअंदाज करता है।


🔶 6. सुधार हेतु सुझाव

  • राज्यसभा को अधिक प्रभावशाली बनाना।

  • अंतर-राज्यीय परिषद को शक्तिशाली बनाना।

  • वित्तीय आयोग की अनुशंसाओं को बाध्यकारी बनाना।

  • राज्यपाल की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना।

  • राज्यों को अधिक वित्तीय स्वायत्तता देना।


🔶 7. निष्कर्ष (Conclusion):

भारत में केंद्र और राज्य के संबंध संविधान द्वारा सुव्यवस्थित हैं, परंतु व्यवहार में इसमें संतुलन और सहयोग की आवश्यकता है। केंद्र को राज्यों के अधिकारों का सम्मान करते हुए संघीय भावना (Federal Spirit) को बनाए रखना चाहिए।

✍️ जैसा कि एस.आर. बोम्मई केस (1994) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
संघवाद भारतीय संविधान की मूल विशेषता है।






Question (3) भारतीय संविधान की विषम विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

Answer :-

भारतीय संविधान की विषम विशेषताएँ (Unusual / Unique / Peculiar Features of the Indian Constitution)

भारतीय संविधान विश्व के अधिकांश संविधानों से कई मायनों में भिन्न और विशिष्ट है। इसकी संरचना, सिद्धांत, व्यवहारिक दृष्टिकोण और विभिन्न व्यवस्थाएँ इसे “विषम” (Peculiar or Unique) बनाती हैं। इन विषमताओं का उद्देश्य भारत जैसे विशाल, विविध और जटिल राष्ट्र के लिए एक ऐसा संविधान तैयार करना था, जो लचीला भी हो और स्थिर भी।


🔷 प्रस्तावना:

भारत का संविधान एक ही समय में:

  • संघीय भी है और एकात्मक भी,

  • कठोर भी है और लचीला भी,

  • लिखित भी है और व्याख्यायित भी

इन्हीं विरोधाभासी विशेषताओं के कारण इसे "विषम संविधान" कहा जाता है।


🔶 भारतीय संविधान की विषम विशेषताएँ (Unusual / Peculiar Features):

✅ 1. संघीय व्यवस्था, परंतु एकात्मक प्रवृत्ति (Federal but Unitary Bias):

  • भारत एक संघीय राज्य है, लेकिन संकट की स्थिति में संविधान पूरी तरह एकात्मक हो जाता है।

  • केंद्र को राज्यों के ऊपर कई विशेषाधिकार प्राप्त हैं (जैसे अनुच्छेद 356)।

  • केंद्र राज्य का विभाजन भी कर सकता है (अनुच्छेद 3) — यह अन्य संघीय देशों में नहीं होता।


✅ 2. लिखित और सबसे लंबा संविधान (Longest Written Constitution):

  • भारतीय संविधान दुनिया का सबसे लंबा लिखित संविधान है।

  • इसमें 25 भाग, 12 अनुसूचियाँ और 470+ अनुच्छेद हैं (संशोधनों के बाद)।


✅ 3. कठोर और लचीलेपन का मिश्रण (Combination of Rigidity and Flexibility):

  • कुछ संशोधन केवल संसद द्वारा ही किए जा सकते हैं (सरल)।

  • कुछ में राज्य विधानसभाओं की सहमति आवश्यक होती है (कठोर)।

  • यह इसे अन्य संविधानों से अलग बनाता है (जैसे अमेरिकी संविधान अत्यधिक कठोर है)।


✅ 4. एकल नागरिकता (Single Citizenship):

  • संघीय व्यवस्था के बावजूद भारत में केवल एक ही नागरिकता है।

  • अमेरिका जैसे देशों में दोहरी नागरिकता (राज्य और संघ) होती है।


✅ 5. अखंड न्यायपालिका प्रणाली (Single Integrated Judiciary):

  • भारत में केंद्र और राज्य दोनों के लिए एकीकृत न्यायिक व्यवस्था है।

  • अन्य संघीय देशों में यह व्यवस्था अलग-अलग होती है।


✅ 6. मूल अधिकारों की न्यायिक संरक्षण सहित व्यवस्था (Justiciable Fundamental Rights):

  • नागरिकों को मूल अधिकार प्राप्त हैं, जिनके उल्लंघन पर वे सीधे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय जा सकते हैं (अनुच्छेद 32)।

  • यह अधिकार संविधान द्वारा संरक्षित हैं।


✅ 7. निर्देशक सिद्धांत – लेकिन गैर-न्यायिक (DPSPs are Non-Justiciable):

  • भाग IV में उल्लिखित निर्देशक सिद्धांत (DPSPs) नीति निर्देशक होते हैं, लेकिन उन्हें अदालत में लागू नहीं किया जा सकता।

  • यह सामाजिक कल्याण का मार्गदर्शक है — एक विशेषता जो कई संविधानों में नहीं पाई जाती।


✅ 8. मौलिक कर्तव्यों की व्यवस्था (Fundamental Duties):

  • मूल अधिकारों के साथ-साथ नागरिकों के लिए मौलिक कर्तव्यों (भाग IV-A) को जोड़ा गया है (42वां संशोधन)।

  • यह सोवियत संविधान से प्रेरित विशेषता है।


✅ 9. स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं का प्रावधान:

  • जैसे चुनाव आयोग, UPSC, CAG, न्यायपालिका आदि की स्वायत्तता।

  • यह उन्हें निष्पक्ष और स्वतंत्र बनाता है — जो लोकतंत्र की रक्षा हेतु आवश्यक है।


✅ 10. समवर्ती सूची (Concurrent List):

  • यह केंद्र और राज्यों दोनों को एक ही विषय पर कानून बनाने की अनुमति देती है।

  • यदि दोनों के कानून टकराते हैं, तो केंद्रीय कानून प्रभावी होता है।


✅ 11. आपातकालीन शक्तियाँ (Emergency Powers):

  • भारत में तीन प्रकार की आपात स्थिति की व्यवस्था है:

    • राष्ट्रीय आपातकाल (Art. 352)

    • राज्य आपातकाल (Art. 356)

    • वित्तीय आपातकाल (Art. 360)

  • इन स्थितियों में संघीय स्वरूप एकात्मक में बदल जाता है।


✅ 12. धर्मनिरपेक्षता की भारतीय परिभाषा (Indian Secularism):

  • भारतीय धर्मनिरपेक्षता सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता (Positive Secularism) है,

  • जिसमें राज्य सभी धर्मों का सम्मान करता है, न कि केवल उनसे दूरी बनाए रखता है।


✅ 13. भाषाई विविधता की संवैधानिक मान्यता:

  • संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को मान्यता दी गई है।

  • यह भारतीय संविधान को भाषाई रूप से भी विषम बनाता है।


🔶 निष्कर्ष (Conclusion):

भारतीय संविधान की ये विषम विशेषताएँ इसे दुनिया के अन्य संविधानों से भिन्न बनाती हैं। यह न केवल कानूनी दस्तावेज है, बल्कि भारत की विविधता, संस्कृति, इतिहास और सामाजिक संरचना का प्रतिबिंब भी है।

✍️ अतः, यह कहना उचित होगा कि
"भारतीय संविधान एक विषम, किंतु व्यावहारिक दस्तावेज है, जो भारत की जटिलताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।"






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