B.A 2 Year 3rd Semester (State Legislature: Composition, Powers and Functions) (राज्य विधानमंडल: संरचना, शक्तियाँ और कार्य)

 State Legislature: Composition, Powers and Functions (राज्य विधानमंडल: संरचना, शक्तियाँ और कार्य)




Question (1) राज्य विधान परिषद का संगठन एवं शक्तियां लिखिए।

Answer :-

भारत के कुछ राज्यों में द्विसदनीय विधायिका (Bicameral Legislature) होती है, जिसका अर्थ है कि वहाँ दो सदन होते हैं:

  1. विधान सभा (Lower House)

  2. विधान परिषद (Upper House)

विधान परिषद को राज्यसभा का राज्यीय समकक्ष (Counterpart) माना जाता है। यह एक स्थायी सदन होता है, जिसे कभी भंग नहीं किया जाता।


राज्य विधान परिषद का संगठन (Composition of Legislative Council)

राज्य विधान परिषद के गठन और कार्य का प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 168 से 212 तक किया गया है।

🔹 1. सदस्यों की संख्या (Article 171)

  • विधान परिषद के सदस्यों की संख्या उस राज्य की विधान सभा के सदस्यों की संख्या की अधिकतम 1/3 हो सकती है।

  • लेकिन यह संख्या 40 से कम नहीं हो सकती (जम्मू-कश्मीर को छोड़कर)।

🔸 उदाहरण: यदि किसी राज्य की विधानसभा में 90 सदस्य हैं, तो विधान परिषद में अधिकतम 30 सदस्य हो सकते हैं।


🔹 2. सदस्य चयन की प्रक्रिया

विधान परिषद के सदस्य सीधे जनता द्वारा नहीं चुने जाते। वे विभिन्न क्षेत्रों से परोक्ष चुनाव और नामांकन के माध्यम से चुने जाते हैं:

श्रेणी प्रतिशत चयन विधि
विधान सभा के सदस्य  लगभग 1/3                                विधायक चुनते हैं
स्थानीय निकाय (नगरपालिका, पंचायत) लगभग 1/3                       स्थानीय प्रतिनिधि चुनते हैं
शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र लगभग 1/12                             शिक्षक चुनते हैं
स्नातक निर्वाचन क्षेत्र लगभग 1/12                        स्नातक मतदाता चुनते हैं
राज्यपाल द्वारा नामित लगभग 1/6           साहित्य, विज्ञान, कला, समाजसेवा आदि के विशेषज्ञ

✳️ राज्यपाल द्वारा नामांकन राज्य में प्रतिष्ठित व्यक्तियों को प्रतिनिधित्व देने के लिए किया जाता है।


🔹 3. कार्यकाल

  • यह एक स्थायी सदन है, इसे भंग नहीं किया जा सकता।

  • हर दो साल में इसके 1/3 सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं और उनके स्थान पर नए सदस्य चुने जाते हैं।

  • प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है।


🔹 4. अध्यक्ष और उपाध्यक्ष

  • परिषद में एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष होता है, जिनका चुनाव परिषद के सदस्य करते हैं।

  • अध्यक्ष परिषद की कार्यवाही का संचालन करता है।


राज्य विधान परिषद की शक्तियाँ (Powers of Legislative Council)

विधान परिषद की शक्तियाँ विधान सभा की तुलना में सीमित हैं। इसे अक्सर "विलंबक सदन" (Delaying House) या "समीक्षात्मक सदन" (Reviewing House) कहा जाता है।


🔹 1. विधायी शक्ति (Legislative Powers)

  • कोई भी विधेयक पहले विधान सभा या विधान परिषद में पेश किया जा सकता है।

  • लेकिन विधान परिषद को विधेयक पास करने से रोकने का अधिकार नहीं है — वह केवल उसे विलंबित (delay) कर सकती है:

    • साधारण विधेयक को अधिकतम 4 सप्ताह तक रोका जा सकता है।

    • यदि विधेयक पहले विधानसभा में पारित हुआ हो और परिषद उसे अस्वीकार कर दे या उसमें संशोधन कर दे, और विधानसभा दोबारा उसे पारित कर दे, तो विधान सभा की ही मंजूरी मान्य होती है


🔹 2. वित्तीय शक्ति (Financial Powers)

  • वित्त विधेयक (Money Bill) केवल विधान सभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है

  • विधान परिषद केवल उसे 14 दिनों के भीतर सुझाव दे सकती है, लेकिन विधानसभा उसे मानने के लिए बाध्य नहीं है।

❌ इसलिए विधान परिषद की वित्तीय शक्ति अत्यंत सीमित होती है।


🔹 3. कार्यपालिका पर नियंत्रण (Control over Executive)

  • कार्यपालिका विधान सभा को उत्तरदायी होती है, विधान परिषद को नहीं।

  • परिषद केवल चर्चा, बहस या सुझाव दे सकती है, लेकिन सरकार को हटाने का अधिकार केवल विधानसभा को होता है (जैसे अविश्वास प्रस्ताव)।


🔹 4. अन्य शक्तियाँ

  • परिषद विधायी प्रक्रिया में भाग लेकर विधेयकों की गुणवत्ता बढ़ाने, संशोधन सुझाने और जनहित की समस्याओं पर चर्चा करने का काम करती है।

  • यह अनुभवी और शिक्षित सदस्यों का मंच होता है जो समाज के विविध क्षेत्रों से आते हैं।


📝 निष्कर्ष (Conclusion):

राज्य विधान परिषद का उद्देश्य राज्य की विधायी प्रक्रिया में गंभीर विचार-विमर्श, संतुलन, और अनुभवी मत प्रदान करना है। हालाँकि इसकी शक्तियाँ सीमित हैं, लेकिन यह कानूनों की समीक्षा करने और चर्चा को गहराई देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

"विधान परिषद नीतियों की समीक्षा का मंच है, जहाँ जल्दबाज़ी में लिए गए फैसलों पर पुनर्विचार किया जा सकता है।"






Question (2) राज्य विधान परिषद का संगठन एवं शक्तियां लिखिए।

Answer :-

राज्य विधान परिषद भारत के कुछ राज्यों में कार्यरत एक द्वितीयक (Upper) सदन है। यह राज्य की द्विसदनीय विधायिका (Bicameral Legislature) का हिस्सा होता है। राज्य विधान परिषद की संरचना और कार्यप्रणाली संविधान के अनुच्छेद 168 से 212 तक वर्णित है।


राज्य विधान परिषद का संगठन (Organisation of Legislative Council)

🔹 1. विधान परिषद की स्थापना

  • सभी राज्यों में विधान परिषद नहीं होती।

  • संविधान के अनुच्छेद 169 के अनुसार, यदि कोई राज्य विधानसभा विशेष प्रस्ताव द्वारा केंद्र से अनुरोध करे और संसद उस पर कानून बनाए, तो उस राज्य में विधान परिषद बनाई जा सकती है या समाप्त की जा सकती है।

🔹 2. सदस्यों की संख्या

  • किसी राज्य की विधान परिषद में सदस्यों की संख्या उसकी विधानसभा के कुल सदस्यों की 1/3 से अधिक नहीं हो सकती, लेकिन 40 से कम नहीं हो सकती

🔹 3. सदस्यों का चयन

विधान परिषद के सदस्य जनता द्वारा सीधे नहीं चुने जाते। इनका चयन परोक्ष मतदान एवं नामांकन द्वारा होता है:

चयन विधि        प्रतिशत कौन चुनता है
विधानसभा के सदस्य            1/3                                              विधायक
स्थानीय निकाय            1/3                                     नगरपालिकाएं, पंचायतें
स्नातक निर्वाचन क्षेत्र            1/12                                          स्नातक मतदाता
शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र          1/12                                        शिक्षक मतदाता
राज्यपाल द्वारा नामित           1/6                      विद्वान, साहित्यकार, कलाकार, समाजसेवी आदि

🔹 4. कार्यकाल

  • विधान परिषद एक स्थायी सदन है, इसे भंग नहीं किया जाता।

  • प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है।

  • हर दो साल में इसके 1/3 सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं और उनके स्थान पर नए सदस्य चुने जाते हैं।

🔹 5. अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष

  • परिषद के सदस्य अध्यक्ष (Chairman) और उपाध्यक्ष (Deputy Chairman) का चुनाव करते हैं।

  • अध्यक्ष परिषद की कार्यवाही संचालित करता है।


राज्य विधान परिषद की शक्तियाँ (Powers of Legislative Council)

🔹 1. विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers)

  • विधान परिषद विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर चर्चा कर सकती है।

  • यदि कोई विधेयक पहले विधानसभा में पारित होता है, तो परिषद उसे 14 या 3 महीनों तक रोक सकती है (विधेयक के प्रकार पर निर्भर)।

  • लेकिन अगर विधानसभा फिर से विधेयक पारित कर दे, तो विधान परिषद उसे रोक नहीं सकती

🔹 2. वित्तीय शक्तियाँ (Financial Powers)

  • वित्त विधेयक (Money Bill) केवल विधानसभा में पेश किया जाता है।

  • विधान परिषद को सिर्फ 14 दिन के भीतर सुझाव देने की अनुमति होती है, जिसे विधानसभा स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है।

  • परिषद इस पर कोई निर्णय नहीं ले सकती।

🔹 3. कार्यपालिका पर नियंत्रण

  • कार्यपालिका केवल विधानसभा को उत्तरदायी होती है, न कि परिषद को।

  • विधान परिषद अविश्वास प्रस्ताव पारित नहीं कर सकती।

  • यह केवल बहस, चर्चा व सुझाव के माध्यम से कार्यपालिका को प्रभावित कर सकती है।

🔹 4. समीक्षात्मक भूमिका (Review Role)

  • यह कानूनों पर गंभीर चर्चा करने, उनमें सुधार के सुझाव देने और सरकार की नीतियों की समीक्षा करने का मंच है।

  • इसे "विलंबक सदन" (Delaying House) भी कहा जाता है, क्योंकि यह कानून पास करने की प्रक्रिया में देरी तो कर सकता है, लेकिन रोक नहीं सकता।


📝 निष्कर्ष (Conclusion)

राज्य विधान परिषद एक समीक्षात्मक और सलाहकारी सदन है, जिसकी भूमिका राज्य की विधायी प्रक्रिया में संतुलन बनाए रखने की होती है। हालाँकि इसकी शक्तियाँ सीमित हैं, लेकिन यह कानूनों की गुणवत्ता सुधारने और विशेषज्ञता आधारित चर्चा के लिए एक आवश्यक मंच प्रदान करता है।

"विधान परिषद लोकतांत्रिक परिपक्वता का प्रतीक है, जो विधायी प्रक्रिया में संतुलन और विवेक लाने का कार्य करती है।"






Question (3) राज्य विधानमंडल का गठन कैसे होता है?

Answer :-

राज्य विधानमंडल (State Legislature) का गठन भारत के संविधान के अनुच्छेद 168 से 212 तक वर्णित है। प्रत्येक राज्य में एक विधायी निकाय होता है, जिसे विधानमंडल कहा जाता है।

भारत में राज्य विधानमंडल का गठन दो प्रकार से हो सकता है:


राज्य विधानमंडल का प्रकार

🔹 1. एकसदनीय विधानमंडल (Unicameral Legislature)

  • जिन राज्यों में केवल विधान सभा (Legislative Assembly) होती है।

  • अधिकांश राज्यों में यही व्यवस्था है।

  • उदाहरण: राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात आदि।

🔹 2. द्विसदनीय विधानमंडल (Bicameral Legislature)

  • जिन राज्यों में विधान सभा और विधान परिषद (Legislative Council) दोनों होते हैं।

  • वर्तमान में भारत के 6 राज्यों में द्विसदनीय व्यवस्था है:
    ➤ उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक।


राज्य विधानमंडल का गठन (Formation of State Legislature)

राज्य विधानमंडल दो सदनों से मिलकर बन सकता है:

🔸 1. विधान सभा (Legislative Assembly – Lower House)

👉 गठन:

  • विधानसभा के सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष चुनाव से चुने जाते हैं।

  • प्रत्येक राज्य को जनसंख्या के आधार पर विधानसभा सीटें मिलती हैं।

👉 सदस्य संख्या:

  • न्यूनतम: 60, अधिकतम: 500 सदस्य (कुछ अपवाद संभव हैं)।
    (जैसे: गोवा में 40 सदस्य, सिक्किम में 32 सदस्य)

👉 कार्यकाल:

  • 5 वर्ष का कार्यकाल (अगर पहले भंग न हो)

  • विधानसभा भंग की जा सकती है – राष्ट्रपति शासन या अन्य परिस्थितियों में।

👉 अध्यक्ष:

  • विधानसभा के सदस्य अध्यक्ष (Speaker) और उपाध्यक्ष (Deputy Speaker) का चुनाव करते हैं।


🔸 2. विधान परिषद (Legislative Council – Upper House) (केवल द्विसदनीय राज्यों में)

👉 गठन:

  • परिषद के सदस्य परोक्ष चुनाव और नामांकन द्वारा चुने जाते हैं।

👉 सदस्य संख्या:

  • विधानसभा के कुल सदस्यों का 1/3, लेकिन 40 से कम नहीं होनी चाहिए।

👉 कार्यकाल:

  • यह स्थायी सदन है, इसे भंग नहीं किया जाता।

  • हर 2 साल में 1/3 सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं।

  • प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष होता है।


विधानमंडल के गठन की प्रक्रिया का सारांश

घटक गठन की विधि कार्यकाल                  प्रमुख अधिकारी
विधान सभा           प्रत्यक्ष चुनाव              5 वर्ष                 अध्यक्ष (Speaker)
विधान परिषद        परोक्ष चुनाव + नामांकन        6 वर्ष (स्थायी सदन)                         अध्यक्ष

निष्कर्ष (Conclusion)

राज्य विधानमंडल का गठन राज्य की शासन व्यवस्था में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के आधार पर किया जाता है। यह जनता के प्रतिनिधियों के माध्यम से कानून निर्माण, नीति निर्धारण और सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करता है। द्विसदनीय व्यवस्था वाले राज्यों में विधान परिषद विचार और समीक्षा की एक अतिरिक्त परत प्रदान करता है।

"राज्य विधानमंडल लोकतंत्र की नींव है, जहाँ जनप्रतिनिधि जनता की आकांक्षाओं को विधायी रूप देते हैं।"






Question (4)  राज्य विधानमंडल के कार्यों को लिखिए।

Answer :-

राज्य विधानमंडल भारत के राज्यों की विधायी इकाई होती है, जो राज्य सरकार के कानून बनाने, निगरानी करने और नीति निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह संविधान के अनुसार राज्य के लोगों का प्रतिनिधित्व करता है और राज्य के प्रशासनिक कार्यों को नियंत्रित करता है।


राज्य विधानमंडल के कार्य (Functions of State Legislature)


1. विधायी कार्य (Legislative Function)

  • राज्य के लिए नए कानून बनाना, पुराने कानूनों में संशोधन करना या उन्हें रद्द करना।

  • विधानमंडल के सदस्यों द्वारा प्रस्तुत विधेयकों (Bills) पर चर्चा और मतदान होता है।

  • विधेयक पास होने के बाद राज्यपाल की मंजूरी के बाद वह कानून बन जाता है।

2. वित्तीय कार्य (Financial Function)

  • राज्य सरकार का बजट (राजस्व और व्यय) प्रस्तुत करना और पारित करना।

  • सभी वित्तीय विधेयक (जैसे टैक्स, खर्च) को विधानमंडल की मंजूरी लेनी होती है।

  • सरकार के वित्तीय प्रबंधन और व्यय पर निगरानी रखना।

3. कार्यपालिका की निगरानी (Executive Control)

  • राज्य सरकार की कार्यप्रणाली और नीतियों की समीक्षा करना।

  • मंत्रिमंडल से प्रश्न पूछना, उत्तर मांगना।

  • अविश्वास प्रस्ताव (No-confidence motion) लाकर सरकार को गिराना (विधान सभा में)।

  • मंत्रियों को जवाबदेह बनाना।

4. प्रतिनिधित्व कार्य (Representation Function)

  • विधानमंडल राज्य की जनता का प्रतिनिधित्व करता है।

  • विभिन्न क्षेत्रों, जातियों, भाषाओं और समुदायों की आवाज़ विधानमंडल में सुनवाई जाती है।

5. विचार-विमर्श (Deliberative Function)

  • राज्य के महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस और चर्चा करना।

  • जनहित के विषयों को उठाना और सरकार को जागरूक करना।

6. संसदीय समितियों का गठन (Formation of Committees)

  • विभिन्न विषयों की गहन जांच के लिए स्थायी या अस्थायी समितियां बनाना।

  • जैसे वित्त समिति, अनुशासन समिति, सामाजिक न्याय समिति आदि।

7. राज्यपाल और मुख्यमंत्री के चुनाव एवं नियुक्ति पर प्रभाव

  • मुख्यमंत्री विधानमंडल का नेता होता है।

  • विधानसभा में बहुमत साबित कर मुख्यमंत्री पद संभालता है।

  • विधानमंडल से सरकार के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जाती है।

8. संविधान संशोधन में भागीदारी (Participation in Constitutional Amendments)

  • कुछ संविधान संशोधनों के लिए राज्यों की विधानसभाओं की मंजूरी आवश्यक होती है।


📝 निष्कर्ष (Conclusion)

राज्य विधानमंडल राज्य की लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की रीढ़ है। यह न केवल कानून बनाता है बल्कि सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करता है और जनता की आवाज़ को शासन तक पहुँचाता है।

"राज्य विधानमंडल शासन की लोकनीति निर्धारित करने वाला संस्थान है, जो जनप्रतिनिधियों के माध्यम से राज्य के विकास और कल्याण की दिशा तय करता है।"






Question (5) राज्य विधान परिषद एवं विधान सभा के बीच पारस्परिक संबंध लिखिए।

Answer :-

बिल्कुल! यहाँ राज्य विधान परिषद और विधान सभा के बीच के पारस्परिक संबंध (Relationship between Legislative Council and Legislative Assembly) को सरल और स्पष्ट तरीके से समझाया गया है:


राज्य विधान परिषद एवं विधान सभा के बीच पारस्परिक संबंध


1. दोनों सदन राज्य विधानमंडल का हिस्सा हैं

  • विधान सभा (Lower House) और विधान परिषद (Upper House) मिलकर राज्य का विधायी संस्थान बनाते हैं।

  • दोनों सदन मिलकर राज्य के कानून बनाते हैं और सरकार की कार्यप्रणाली की निगरानी करते हैं।


2. सदस्यों का चयन और कार्यकाल

  • विधान सभा के सदस्य सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं और इनका कार्यकाल 5 वर्ष होता है।

  • विधान परिषद के सदस्य परोक्ष चुनाव और नामांकन द्वारा चुने जाते हैं, और वे स्थायी सदन होते हैं जिनका कार्यकाल 6 वर्ष होता है।


3. विधायी प्रक्रिया में सहभागिता

  • दोनों सदन किसी भी सामान्य विधेयक (Non-Money Bill) पर चर्चा कर सकते हैं।

  • विधेयक दोनों सदनों में पारित होना जरूरी होता है, लेकिन विधान परिषद के पास इसे रोकने का अधिकार नहीं होता, केवल विलंब करने का अधिकार होता है।


4. वित्तीय विधेयक (Money Bill) पर अधिकार

  • वित्तीय विधेयक केवल विधान सभा में प्रस्तुत किए जाते हैं।

  • विधान परिषद इसे केवल 14 दिनों के अंदर स्वीकार या सुझाव देने के लिए देख सकती है, पर उसे पास या अस्वीकार करने का अधिकार नहीं है।


5. विधायी शक्ति में श्रेष्ठता

  • यदि दोनों सदनों में किसी विधेयक को लेकर मतभेद हो, तो विधान सभा की राय को प्रधान माना जाता है।

  • विधान परिषद के सुझावों को विधानसभा द्वारा स्वीकार करना आवश्यक नहीं होता।


6. कार्यपालिका पर नियंत्रण

  • कार्यपालिका विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है, न कि विधान परिषद के प्रति।

  • इसलिए, विधानसभा के पास मंत्रिमंडल को हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाने का अधिकार होता है, जबकि विधान परिषद के पास ऐसा अधिकार नहीं है।


7. समीक्षा और परामर्श की भूमिका

  • विधान परिषद को अक्सर “समीक्षात्मक” और “विलंबक” सदन कहा जाता है।

  • यह विधान सभा द्वारा पारित विधेयकों की गहन समीक्षा, बहस और सुझाव देने का कार्य करता है।


📝 संक्षेप में सारांश

विषय विधान सभा (Assembly) विधान परिषद (Council) पारस्परिक संबंध
सदस्य चयन प्रत्यक्ष चुनाव परोक्ष चुनाव + नामांकन सदस्यों के चयन में भिन्नता
कार्यकाल 5 वर्ष 6 वर्ष (स्थायी सदन) कार्यकाल में अंतर
विधायी शक्ति पूर्ण अधिकार सीमित अधिकार विधान सभा सर्वोच्च
वित्तीय विधेयक प्रस्तुत करती है केवल सुझाव देती है वित्तीय मामलों में अधीनता
कार्यपालिका नियंत्रण अविश्वास प्रस्ताव ला सकती है अविश्वास प्रस्ताव नहीं ला सकती विधानसभा प्रमुख भूमिका
विधेयक पारित करना अनिवार्य समीक्षा एवं विलंब विधान परिषद परAssembly की श्रेष्ठता

निष्कर्ष:

राज्य विधान परिषद और विधान सभा एक-दूसरे के पूरक हैं।
विधान सभा सत्ता का मुख्य केंद्र होती है, जबकि विधान परिषद एक परामर्शदाता और समीक्षात्मक भूमिका निभाता है। दोनों मिलकर विधायी प्रक्रिया को संतुलित और पूर्ण बनाते हैं।






Question (6)  राज्य विधानमंडल की शक्तियों की सीमाएँ लिखिए।

Answer :-

बिल्कुल! यहाँ राज्य विधानमंडल की शक्तियों की सीमाएँ विस्तारपूर्वक समझाई गई हैं:


राज्य विधानमंडल की शक्तियों की सीमाएँ (Limitations of State Legislature Powers)

राज्य विधानमंडल भारत के राज्यों की विधायी इकाई होती है, लेकिन इसकी शक्तियाँ संविधान और संघीय व्यवस्था के तहत कुछ सीमाओं के अंतर्गत रहती हैं। इन सीमाओं का उद्देश्य केंद्र और राज्य के बीच संतुलन बनाए रखना है, जिससे पूरे देश में समन्वित शासन व्यवस्था बनी रहे।


1. विधायी शक्ति की सीमाएँ

  • केवल राज्य सूची और कुछ संयुक्त सूची पर कानून बना सकता है:
    राज्य विधानमंडल केवल संविधान के तीसरे भाग (State List) और कुछ मामलों में संयुक्त सूची (Concurrent List) के विषयों पर ही कानून बना सकता है।
    केंद्र सूची (Union List) के विषय राज्य विधानमंडल के अधिकार क्षेत्र से बाहर होते हैं। उदाहरण के लिए, रक्षा, विदेश नीति, मुद्रा आदि पर राज्य विधानमंडल कानून नहीं बना सकता।

  • केंद्र के कानून की प्राथमिकता:
    यदि केंद्र सरकार ने किसी विषय पर कानून बनाया है जो संयुक्त सूची में आता है, तो उस मामले में केंद्र सरकार का कानून राज्य विधानमंडल के कानून से ऊपर माना जाएगा।
    इससे राज्य विधानमंडल की स्वायत्तता सीमित हो जाती है।


2. वित्तीय शक्तियों की सीमाएँ

  • वित्तीय विधेयक केवल विधानसभा में प्रस्तुत:
    राज्य के वित्तीय विधेयकों (जैसे बजट, टैक्स) को केवल विधान सभा में पेश किया जा सकता है।
    विधान परिषद वित्तीय विधेयकों पर केवल 14 दिनों तक सुझाव दे सकती है, जिसे विधानसभा मानने या न मानने की स्वतंत्रता रखती है।
    इससे विधान परिषद की वित्तीय शक्ति नगण्य हो जाती है।

  • केन्द्र के वित्तीय नियंत्रण:
    केंद्र सरकार राज्य को वित्तीय सहायता और धनराशि उपलब्ध कराती है, जिससे राज्य की आर्थिक स्वायत्तता सीमित हो जाती है।
    इसके अतिरिक्त, केंद्र के पास राज्यों के वित्तीय मामलों पर भी नियंत्रण और मार्गदर्शन होता है।


3. कार्यपालिका पर नियंत्रण की सीमाएँ

  • अविश्वास प्रस्ताव केवल विधानसभा में:
    राज्य सरकार केवल विधानसभा को ही जवाबदेह होती है। विधानसभा में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है, जिससे सरकार गिर सकती है।
    विधान परिषद के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं होता।

  • मंत्रियों की जवाबदेही:
    मंत्री केवल विधानसभा के प्रति ही जवाबदेह होते हैं, न कि विधान परिषद के प्रति। इससे विधान परिषद की कार्यपालिका नियंत्रण क्षमता सीमित रहती है।


4. विधायी प्रक्रिया में सीमाएँ

  • विधान परिषद के पास बाधा डालने की सीमित क्षमता:
    विधान परिषद किसी भी विधेयक (सामान्य विधेयक) को अधिकतम 3 से 6 महीने के लिए टाल सकती है, लेकिन इसे स्थायी रूप से रोक नहीं सकती।
    यदि विधान परिषद इस अवधि में विधेयक को पास नहीं करती, तो विधानसभा पुनः उसे पास कर सकती है और वह कानून बन जाता है।
    इससे विधान परिषद की विधायी शक्ति सीमित हो जाती है।

  • विधेयक के मतभेद की स्थिति में विधानसभा की श्रेष्ठता:
    दोनों सदनों के बीच यदि विधेयक को लेकर मतभेद होता है, तो विधान सभा की राय को सर्वोपरि माना जाता है।


5. संवैधानिक एवं संघीय सीमाएँ

  • राष्ट्रपति शासन के दौरान विधानमंडल का निलंबन:
    यदि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है (अनुच्छेद 356 के तहत), तो राज्य विधानमंडल निलंबित या भंग किया जा सकता है।
    इससे विधानमंडल की स्वायत्तता पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।

  • संघीय संरचना के कारण सीमित अधिकार:
    भारत एक संघात्मक देश है, इसलिए राज्य विधानमंडल की शक्तियाँ संघीय संविधान के अधीन होती हैं।
    केंद्र और राज्य के बीच शक्ति का विभाजन स्पष्ट है, जो राज्य विधानमंडल की शक्तियों को सीमित करता है।


6. सदस्य चयन और जनप्रतिनिधित्व में सीमाएँ (विशेषकर विधान परिषद के लिए)

  • विधान परिषद के सदस्यों का परोक्ष चयन:
    विधान परिषद के सदस्यों को जनता द्वारा सीधे नहीं चुना जाता, जिससे इसका जनप्रतिनिधित्व विधानसभा की तुलना में कम मजबूत होता है।
    इससे इसकी लोकतांत्रिक वैधता और प्रभावशीलता पर असर पड़ता है।

  • स्थायी सदन होने के कारण परिवर्तन में बाधा:
    विधान परिषद स्थायी सदन होता है, जिसे भंग नहीं किया जा सकता।
    इसका अर्थ है कि यदि परिषद में अप्रासंगिक या गैर-लोकप्रिय सदस्य हों, तो उन्हें हटाने का कोई त्वरित तरीका नहीं होता।


निष्कर्ष:

राज्य विधानमंडल की शक्तियाँ संविधान और संघीय व्यवस्था के दायरे में सीमित हैं। ये सीमाएँ केंद्र और राज्य के बीच सत्ता संतुलन बनाए रखने, एकीकृत शासन सुनिश्चित करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए आवश्यक हैं।
हालांकि ये सीमाएँ राज्य विधानमंडल की भूमिका को कम नहीं करतीं, पर इनके कारण कुछ क्षेत्राधिकारों में उसकी स्वतंत्रता सीमित होती है।






Question (7) राज्य विधान परिषद के पक्ष और विपक्ष में तीन-तीन तर्क दीजिए।

Answer :-

राज्य विधान परिषद के पक्ष और विपक्ष में तर्क (Detailed Arguments For and Against Legislative Council)


राज्य विधान परिषद के पक्ष में तर्क

1. विधायी समीक्षा और गुणवत्ता सुधार

विधान परिषद राज्य के विधायी कार्यों का पुनरावलोकन और समीक्षा करती है।

  • यह सदन विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर गहन चर्चा करता है और उनमें सुधार के सुझाव देता है।

  • इससे जल्दबाजी में बनाए गए अधूरे या कमज़ोर कानूनों की संभावना कम हो जाती है।

  • विधायी प्रक्रिया में यह दूसरा स्तर जोड़ता है जो कानूनों की गुणवत्ता बढ़ाता है।

2. अनुभवी और विशेषज्ञ सदस्यों का योगदान

विधान परिषद के सदस्य अकसर अनुभवी, विद्वान या विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ होते हैं।

  • वे अक्सर राजनीति से अलग, शिक्षाविद्, प्रशासनिक अधिकारी या सामाजिक कार्यकर्ता होते हैं।

  • इनके अनुभव से विधानमंडल की कार्यप्रणाली अधिक समझदारी और स्थिरता से चलती है।

  • ये सदन लंबी अवधि के नजरिये से नीति और कानूनों पर विचार करता है।

3. विधायी प्रक्रिया में संतुलन और विलंबक भूमिका

विधान परिषद एक स्थायी सदन होने के कारण विधान सभा के निर्णयों पर तत्काल प्रभाव नहीं डालता, लेकिन

  • यह कानूनों के पारित होने में आवश्यक विलंब प्रदान करता है, जिससे पुनर्विचार और सुधार के अवसर मिलते हैं।

  • यह किसी भी विधेयक के अचानक पारित होने या राजनीतिक दबाव में लिए गए निर्णयों को रोकने में मदद करता है।

  • इस प्रकार यह लोकतंत्र में संतुलन बनाता है और त्रुटिपूर्ण विधायी निर्णयों को रोकता है।


राज्य विधान परिषद के विपक्ष में तर्क

1. अतिरिक्त खर्च और संसाधनों की बर्बादी

विधान परिषद के संचालन, सदस्यों के वेतन, सुविधाओं और संसाधनों में भारी धनराशि खर्च होती है।

  • कई बार इसे व्यर्थ और अनावश्यक खर्च माना जाता है, खासकर जब इसकी विधायी भूमिका सीमित होती है।

  • यह राज्य के बजट पर बोझ डालता है, जिसे अन्य विकास कार्यों में लगाया जा सकता था।

  • छोटे या सीमित संसाधनों वाले राज्यों में इसकी आर्थिक लागत अधिक चिंता का विषय होती है।

2. लोकतांत्रिक वैधता और जनप्रतिनिधित्व की कमी

विधान परिषद के अधिकांश सदस्य प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा नहीं चुने जाते, बल्कि परोक्ष चुनाव, नामांकन या चयन प्रक्रिया से आते हैं।

  • इससे यह जनता का सीधा प्रतिनिधि नहीं बन पाता।

  • इसकी लोकतांत्रिक वैधता और जवाबदेही विधानसभा की तुलना में कम होती है।

  • इससे कभी-कभी इसे 'अर्ध-लोकतांत्रिक' या 'अप्रासंगिक' सदन कहा जाता है।

3. विधायी प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब और बाधा

विधान परिषद कभी-कभी कानूनों की मंजूरी में अनावश्यक देरी करता है।

  • इससे सरकार की नीतियों और विकास कार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

  • यदि विधान परिषद राजनीतिक विरोध या व्यक्तिगत हितों के कारण विलंब करती है, तो प्रशासनिक कार्यों में रुकावट होती है।

  • इससे जनता और प्रशासन के बीच दूरी बढ़ती है, और शासन की गति धीमी पड़ती है।


संक्षेप में:

पक्ष में तर्क विपक्ष में तर्क
1. विधायी समीक्षा से कानूनों की
गुणवत्ता बढ़ती है।
                                   1. अतिरिक्त खर्च राज्य के वित्त पर बोझ है।
2. अनुभवी और विशेषज्ञ सदन के
सदस्यों से स्थिरता आती है।
                                               2. प्रत्यक्ष जनप्रतिनिधित्व की कमी।
3. विधायी प्रक्रिया में संतुलन और
विलंबक भूमिका निभाता है।
                                     3. कानून बनाने में अनावश्यक विलंब और
                                                   बाधा उत्पन्न करता है।





Question (8) राज्य विधानमंडल में साधारण विधेयक पारित करने की प्रक्रिया लिखिए।

Answer :-

राज्य विधानमंडल में साधारण विधेयक पारित करने की प्रक्रिया


राज्य विधानमंडल में कोई भी साधारण विधेयक (Ordinary Bill) पारित करने के लिए कुछ निर्धारित चरणों का पालन किया जाता है। ये चरण विधायी प्रक्रिया को व्यवस्थित और लोकतांत्रिक बनाते हैं।


1. विधेयक का प्रस्तुतिकरण (Introduction of the Bill)

  • विधेयक को राज्य सरकार के किसी मंत्री या किसी अन्य सदस्य (सदस्य निजी सदस्य हो सकता है) द्वारा विधान सभा या विधान परिषद में पेश किया जाता है।

  • विधेयक प्रस्तुत करने को प्रस्ताव (First Reading) कहा जाता है।

  • इस चरण में विधेयक का मुख्य उद्देश्य और विषय सदन के समक्ष रखा जाता है, लेकिन विस्तार में चर्चा नहीं होती।


2. प्रारंभिक चर्चा (General Discussion)

  • विधेयक के विषय पर सदस्यों के बीच सामान्य बहस होती है।

  • इस चरण में विधेयक के पक्ष और विपक्ष दोनों पक्षों के तर्क रखे जाते हैं।

  • सदन विधेयक के मूल विचार से सहमत या असहमत हो सकता है।


3. समिति को भेजना (Referral to Committee - Optional)

  • यदि आवश्यक समझा जाए तो विधेयक को विधायी समिति (जैसे स्थायी समिति या विशेष समिति) को भेजा जाता है।

  • समिति विधेयक का गहन अध्ययन करती है, संबंधित विशेषज्ञों और जनता की राय लेती है।

  • समिति सुझाव और संशोधन के साथ रिपोर्ट सदन को प्रस्तुत करती है।

  • यह चरण आवश्यक नहीं है, लेकिन जटिल विधेयकों के लिए बहुत उपयोगी होता है।


4. विधेयक पर विस्तार से चर्चा और संशोधन (Detailed Discussion and Amendments)

  • विधेयक पर सदन में विस्तार से चर्चा होती है।

  • सदस्यों द्वारा संशोधन प्रस्ताव (Amendments) प्रस्तुत किए जा सकते हैं।

  • संशोधनों पर मतदान हो सकता है और आवश्यकतानुसार विधेयक में परिवर्तन किया जाता है।


5. विधेयक का पारित होना (Passing the Bill)

  • सभी चर्चा और संशोधनों के बाद सदन में विधेयक पर अंतिम मतदान होता है।

  • विधेयक के पारित होने के लिए साधारण बहुमत (Majority of members present and voting) आवश्यक होता है।

  • यदि विधेयक सदन द्वारा पारित हो जाता है, तो वह अगले सदन (यदि द्विसदनीय विधानमंडल है) को भेजा जाता है।


6. दूसरे सदन में विधेयक की प्रक्रिया (If Bicameral Legislature)

  • दूसरे सदन (विधान परिषद) में विधेयक के समान चरण (प्रस्ताव, चर्चा, संशोधन, मतदान) होते हैं।

  • यदि दूसरा सदन विधेयक में संशोधन करता है, तो वह संशोधित विधेयक पहले सदन को भेजता है।

  • यदि मतभेद होता है तो सदनों के बीच समझौता हो सकता है, लेकिन विधान सभा की राय प्राथमिक होती है।


7. राज्यपाल की मंजूरी (Assent of the Governor)

  • दोनों सदनों से पारित विधेयक राज्यपाल को भेजा जाता है।

  • राज्यपाल विधेयक को मंजूरी दे सकते हैं, या इसे वापस विचार के लिए भेज सकते हैं, या लागू करने से इनकार भी कर सकते हैं।

  • यदि राज्यपाल पुनर्विचार के लिए भेजता है और विधानमंडल पुनः विधेयक पारित कर देता है, तो राज्यपाल को इसे मंजूरी देनी होती है।


8. विधेयक का कानून बनना (Becoming Law)

  • राज्यपाल की मंजूरी के बाद विधेयक कानून बन जाता है।

  • सरकार इसे लागू करने के लिए आवश्यक नियम और आदेश जारी करती है।


संक्षेप में, साधारण विधेयक पारित करने के चरण:

  1. विधेयक का प्रस्ताव (First Reading)

  2. सामान्य चर्चा (General Discussion)

  3. समिति को भेजना (Committee Stage - Optional)

  4. विस्तार से चर्चा और संशोधन (Detailed Discussion & Amendments)

  5. विधेयक पारित करना (Passing in First House)

  6. दूसरे सदन में प्रक्रिया (If applicable)

  7. राज्यपाल की मंजूरी (Governor’s Assent)

  8. कानून बनना (Becoming Law)





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