B.A 2 Year 3 Semester | किसान एवं आदिवासी विद्रोह (PEASANT AND TRIBAL UPRISINGS)

 किसान एवं आदिवासी विद्रोह (PEASANT AND TRIBAL UPRISINGS)



प्रश्न 1. 1857 ई० से पूर्व के कृषकों और आदिवासियों के कम्पनी के विरुद्ध आन्दोलनों के मुख्य कारण क्या थे ?

Answer

1857 ई. से पूर्व कृषकों और आदिवासियों द्वारा ईस्ट इंडिया कम्पनी के विरुद्ध जो आंदोलन हुए, उनके पीछे अनेक सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक कारण थे। इन आन्दोलनों ने भविष्य में 1857 के विद्रोह की भूमि तैयार की। नीचे इन आन्दोलनों के प्रमुख कारण दिए गए हैं:


🌾 कृषकों के आंदोलन के मुख्य कारण:

  1. भूमि कर की नीतियाँ:

    • ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भारी भू-राजस्व वसूली शुरू की।

    • ज़मींदारी, राययतवारी और महलवारी प्रणालियों ने किसानों पर कर का बोझ बढ़ा दिया।

    • समय पर कर न देने पर किसानों की जमीनें नीलाम कर दी जाती थीं।

  2. उपज का एकतरफा दोहन:

    • कम्पनी ने किसानों को नकदी फसलें (जैसे – नील, कपास, अफीम) उगाने को मजबूर किया।

    • इससे खाद्यान्न उत्पादन घटा और किसान भुखमरी की स्थिति में पहुँच गए।

  3. साहूकारों और महाजनों का शोषण:

    • किसानों को ऊँची ब्याज दरों पर ऋण लेना पड़ता था।

    • कर्ज न चुका पाने पर जमीनें गिरवी या छिन जाती थीं।

  4. स्थानीय उद्योगों का पतन:

    • अंग्रेजों की नीतियों के कारण ग्रामीण दस्तकारी और कुटीर उद्योग समाप्त हो गए, जिससे किसानों पर आर्थिक दबाव और बढ़ा।


🌲 आदिवासियों के आंदोलन के मुख्य कारण:

  1. जंगलों पर अधिकार का हनन:

    • ब्रिटिश शासन ने जंगलों को ‘सरकारी संपत्ति’ घोषित कर दिया।

    • आदिवासियों को लकड़ी, चारा, शिकार आदि से वंचित कर दिया गया।

  2. विदेशी प्रभाव और हस्तक्षेप:

    • आदिवासियों की संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली में बाहरी हस्तक्षेप बढ़ा।

    • मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन की कोशिशें भी असंतोष का कारण बनीं।

  3. दिकुओं (बाहरी लोगों) का आगमन:

    • व्यापारी, साहूकार, ठेकेदार आदि आदिवासी क्षेत्रों में घुस आए और उनका शोषण किया।

  4. जमींदारी व्यवस्था का थोपना:

    • पारंपरिक आदिवासी स्वशासन (मुखिया प्रणाली) को खत्म कर दिया गया।

    • भूमि पर अधिकार समाप्त कर जमींदारों और ठेकेदारों को अधिकार दे दिया गया।


🔥 प्रमुख आंदोलन (1857 से पूर्व):

आंदोलन वर्ष क्षेत्र प्रमुख कारण
संथाल विद्रोह 1855-56 बिहार, बंगाल जमींदारों, साहूकारों, ब्रिटिश अधिकारियों का शोषण
कोल विद्रोह 1831-32 झारखंड दिकुओं का शोषण, भूमि हड़पना
भील विद्रोह 1818-1831 महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश ब्रिटिश हस्तक्षेप, भारी कर
चुआड़ विद्रोह 1767-1833 बंगाल कर वृद्धि, वन अधिकार हनन
नील विद्रोह 1859-60 (पूर्व तैयारी) बंगाल जबरदस्ती नील की खेती

निष्कर्ष:

कुल मिलाकर, 1857 से पूर्व किसानों और आदिवासियों का असंतोष ब्रिटिश शासन की आर्थिक शोषण नीति, सांस्कृतिक हस्तक्षेप, और परंपरागत अधिकारों के उल्लंघन के कारण था। ये आंदोलन संगठित भले न थे, लेकिन उन्होंने 1857 की क्रांति के लिए मानसिक और सामाजिक भूमि तैयार की।






प्रश्न:1857 ई० से पूर्व के कृषकों और कबाइलियों अथवा आदिवासियों के आन्दोलनों के मुख्य कारण क्या थे?

Answer 


परिचय:

1857 की क्रांति से पहले भारत में अनेक किसान और कबायली (आदिवासी) आंदोलन हुए। ये आंदोलन ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक नीतियों के विरोध में थे। कृषक और आदिवासी समाज कम्पनी के शोषणकारी रवैये से अत्यधिक पीड़ित था। इन आंदोलनों ने ब्रिटिश शासन की नींव को हिला दिया और 1857 की क्रांति के लिए पृष्ठभूमि तैयार की।


🌾 कृषकों (किसानों) के आंदोलनों के मुख्य कारण:

भू-राजस्व व्यवस्था का शोषणकारी स्वरूप:

    • ज़मींदारी, राययतवारी और महलवारी व्यवस्थाओं ने किसानों पर कर का अत्यधिक बोझ डाला।

    • किसान समय पर कर नहीं चुका पाते थे, जिससे उनकी ज़मीनें नीलाम हो जाती थीं।

नकदी फसलों की जबरदस्ती:

    • अंग्रेजों ने किसानों को नील, कपास, अफीम जैसी नकदी फसलें उगाने को बाध्य किया।

    • इससे खाद्य संकट और भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हुई।

महाजन और साहूकारों का शोषण:

    • किसान कर्ज में डूबते गए। ऊँची ब्याज दरें और जबरन वसूली आम हो गई।

    • कर्ज न चुका पाने पर ज़मीनें छीनी जाने लगीं।

स्थानीय कुटीर उद्योगों का पतन:

    • ब्रिटिश वस्त्र उद्योग को लाभ पहुँचाने के लिए भारत के पारंपरिक उद्योगों को नष्ट किया गया।

    • इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा गई और किसान आर्थिक संकट में आ गए।


🌲 कबाइलियों (आदिवासियों) के आंदोलनों के मुख्य कारण:

जंगल अधिकारों का हनन:

    • अंग्रेजों ने जंगलों को "सरकारी संपत्ति" घोषित किया।

    • आदिवासियों को जंगल से लकड़ी, चारा, शिकार आदि के अधिकार से वंचित कर दिया गया।

दिकुओं (बाहरी लोगों) का प्रवेश और शोषण:

    • व्यापारी, साहूकार, ठेकेदार, मिशनरी आदि आदिवासी क्षेत्रों में प्रवेश कर उनका शोषण करने लगे।

पारंपरिक प्रशासनिक व्यवस्था का अंत:

    • मुखिया प्रणाली और पारंपरिक आदिवासी नेतृत्व को समाप्त कर दिया गया।

    • उनकी जगह ब्रिटिश अधिकारियों और जमींदारों को सत्ता सौंप दी गई।

धार्मिक और सांस्कृतिक हस्तक्षेप:

    • मिशनरियों द्वारा धर्म-परिवर्तन की कोशिशों से आदिवासियों की सांस्कृतिक अस्मिता को चोट पहुँची।


🔥 प्रमुख किसान और आदिवासी आंदोलन (1857 से पूर्व):

आंदोलन वर्ष क्षेत्र नेतृत्व / विशेषता
संथाल विद्रोह 1855-56 झारखंड, बंगाल संथालों द्वारा ज़मींदारों और अंग्रेजों के खिलाफ
कोल विद्रोह 1831-32 छोटानागपुर दिकुओं और प्रशासन के खिलाफ
नील विद्रोह 1859-60 (पूर्व तैयारी) बंगाल किसानों ने नील की जबरन खेती के खिलाफ विद्रोह किया
भील विद्रोह 1818-1831 महाराष्ट्र ब्रिटिश शासन और कर के खिलाफ
चुआड़ विद्रोह 1767-1833 बंगाल भू-राजस्व नीति के विरोध में

📝 निष्कर्ष:

1857 ई. से पूर्व के किसान और आदिवासी आंदोलन ब्रिटिश शासन की शोषणकारी आर्थिक नीतियों, संस्कृति और परंपराओं में हस्तक्षेप, तथा स्थानीय स्वशासन की समाप्ति के कारण हुए। इन आंदोलनों ने ब्रिटिश शासन की क्रूरता के प्रति जन-असंतोष को जन्म दिया और आगे चलकर 1857 की क्रांति के लिए माहौल तैयार किया।






प्रश्न 2. कम्पनी के शासन के विरुद्ध होने वाले प्रारम्भिक विद्रोहों के बारे में आप क्या जानते हैं ?

Answer


परिचय:

ईस्ट इंडिया कम्पनी ने 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से भारत पर अपने शासन का विस्तार करना शुरू किया। कम्पनी की शोषणकारी नीतियों, आर्थिक लूट, राजनैतिक हस्तक्षेप और सांस्कृतिक आक्रमण के कारण भारत में अनेक स्थानों पर असंतोष पनपने लगा। यह असंतोष कई बार सशस्त्र विद्रोहों के रूप में सामने आया, जिन्हें हम "प्रारम्भिक विद्रोह" कहते हैं।

ये विद्रोह 1857 की पहली स्वतंत्रता संग्राम से पहले हुए और उसे प्रेरणा देने वाले सिद्ध हुए।


🔥 प्रमुख प्रारम्भिक विद्रोह (1857 से पूर्व):

विद्रोह वर्ष क्षेत्र नेतृत्व कारण
पलासी का युद्ध 1757 बंगाल सिराजुद्दौला (नवाब) कम्पनी की गद्दारी व व्यापारिक महत्वाकांक्षा
बक्सर का युद्ध 1764 बिहार मीर कासिम, शाह आलम द्वितीय कम्पनी के बढ़ते हस्तक्षेप
चेट्टुपल्ली विद्रोह 1775 आंध्र प्रदेश किसान और ज़मींदारों का कम्पनी के खिलाफ विरोध
सन् 1781 का 'विद्रोह' (नायक विद्रोह) 1781 मद्रास भारतीय सैनिक (सेपॉय) वेतन कटौती और भेदभाव
वल्लभ भाई पटेल का बड़ौदा विद्रोह 1800 के दशक गुजरात कम्पनी की नीतियों से असंतोष
पजंसर rebellion (पाली) 1817 महाराष्ट्र स्थानीय किसान भू-कर का विरोध
संथाल विद्रोह 1855-56 झारखंड सिद्धू, कान्हू ज़मींदारों, साहूकारों और कम्पनी का शोषण

🛡️ प्रमुख सैन्य विद्रोह (सेपॉय विद्रोह):

1. वेल्लोर विद्रोह (1806):

  • स्थान: वेल्लोर किला (तमिलनाडु)

  • नेतृत्व: भारतीय सैनिक (सेपॉय)

  • कारण:

    • धार्मिक भावनाओं को ठेस – सैनिकों को पहनने के लिए ऐसे टोप और वर्दी दी गई जो उनकी धार्मिक आस्थाओं के विरुद्ध थी।

    • ईसाई धर्म अपनाने का दबाव।

  • परिणाम: विद्रोह दबा दिया गया, परन्तु यह 1857 के विद्रोह का पूर्व संकेत था।


🌾 किसान और आदिवासी विद्रोह:

विद्रोह वर्ष क्षेत्र कारण
भील विद्रोह 1818-1831 मध्य भारत अंग्रेजों द्वारा भूमि पर कब्ज़ा और शोषण
कोल विद्रोह 1831-32 झारखंड ज़मींदारी प्रथा और बाहरी हस्तक्षेप
नील विद्रोह 1859-60 (पूर्व तैयारी 1850 के दशक में) बंगाल किसानों को जबरन नील की खेती करवाना

📌 इन विद्रोहों के मुख्य कारण:

  1. ब्रिटिश आर्थिक शोषण

    • करों की अधिकता, व्यापारिक एकाधिकार, कुटीर उद्योगों का विनाश।

  2. धार्मिक-सांस्कृतिक हस्तक्षेप

    • मिशनरियों की गतिविधियाँ, धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप।

  3. सेनाओं में भेदभाव

    • भारतीय सैनिकों के साथ अमानवीय व्यवहार, वेतन में असमानता।

  4. आस्थाओं पर आक्रमण

    • धार्मिक रीति-रिवाजों का अपमान (जैसे वेल्लोर विद्रोह में)।

  5. जंगलों और जमीन पर अधिकार की समाप्ति

    • आदिवासी समाज के पारंपरिक जीवन को तोड़ना।


📝 निष्कर्ष:

कम्पनी के शासन के विरुद्ध प्रारम्भिक विद्रोहों ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत की जनता अंग्रेजों के शासन से असंतुष्ट थी। ये विद्रोह भले ही स्थानीय और असंगठित थे, परंतु उन्होंने ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी और 1857 की क्रांति के लिए वातावरण तैयार किया






प्रश्न:

1857 ई० से पूर्व के आदिवासी एवं किसान के कम्पनी राज्य के विरुद्ध आन्दोलनों का वर्णन कीजिए।

Answer


परिचय:

1857 की क्रांति से पहले भारत में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी के विरुद्ध अनेक आदिवासी और किसान आंदोलनों की लहरें उठीं। ये आंदोलन ब्रिटिश शासन की शोषणकारी नीतियों, भू-राजस्व व्यवस्था, जंगल अधिकारों की समाप्ति, और स्थानीय परंपराओं में हस्तक्षेप के विरुद्ध थे। ये आंदोलन भले ही स्थानीय और असंगठित रहे, लेकिन इन्होंने भारत में जन-असंतोष को स्वर दिया और 1857 की क्रांति की नींव रखी।


🌾 किसानों के आन्दोलन:

1. नील विद्रोह (1859-60 की पूर्व भूमिका):

  • स्थान: बंगाल (नदिया, मुर्शिदाबाद, पबना, आदि जिलों में)

  • कारण:

    • किसानों को जबरदस्ती नील की खेती करने पर मजबूर किया गया।

    • उन्हें उचित मूल्य नहीं दिया जाता था।

    • विरोध करने पर मारपीट व अत्याचार किए जाते थे।

  • परिणाम:

    • किसानों ने नील की खेती करने से इनकार कर दिया।

    • व्यापक विरोध के चलते ब्रिटिश सरकार को नील आयोग गठित करना पड़ा।


2. पजंसर और विदर्भ क्षेत्र के किसान आंदोलन:

  • स्थान: महाराष्ट्र

  • कारण:

    • कंपनी की भूमि कर व्यवस्था अत्यधिक कठोर थी।

    • किसानों की भूमि नीलाम की जाती थी।

  • विशेषता:

    • किसानों ने समूहों में मिलकर कर नहीं चुकाया और सरकारी अधिकारियों का विरोध किया।


🌲 आदिवासियों के आन्दोलन:

1. संथाल विद्रोह (1855-56):

  • स्थान: झारखंड, बिहार और बंगाल की सीमा पर संथाल परगना

  • नेता: सिद्धू और कान्हू

  • कारण:

    • साहूकारों, ज़मींदारों और अंग्रेज अधिकारियों द्वारा शोषण

    • जंगल और जमीन से बेदखली

    • 'दिकुओं' (बाहरी लोगों) का हस्तक्षेप

  • परिणाम:

    • ब्रिटिश सेना द्वारा विद्रोह को दबा दिया गया।

    • हजारों संथाल मारे गए, लेकिन इसने अंग्रेजों को हिला दिया।


2. कोल विद्रोह (1831-32):

  • स्थान: छोटानागपुर (वर्तमान झारखंड क्षेत्र)

  • नेता: बुधु भगत और अन्य आदिवासी सरदार

  • कारण:

    • पारंपरिक मुखिया प्रणाली को खत्म कर ज़मींदारी प्रथा लागू करना।

    • गैर-आदिवासी ‘दिकुओं’ का शोषण

    • जबरन कर वसूली और अत्याचार

  • परिणाम:

    • विद्रोह अत्यंत उग्र था, ब्रिटिश सेना को हस्तक्षेप करना पड़ा।

    • बड़ी संख्या में आदिवासी मारे गए।


3. भील विद्रोह (1818-1831):

  • स्थान: महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और राजस्थान के कुछ भाग

  • नेता: भील जनजातीय सरदार

  • कारण:

    • अंग्रेजों द्वारा जंगल और भूमि पर अधिकार

    • स्थानीय परंपराओं का उल्लंघन

    • बढ़े हुए कर

  • परिणाम:

    • विद्रोह को क्रूरता से दबाया गया।


4. चुआड़ विद्रोह (1767-1833):

  • स्थान: पश्चिम बंगाल और झारखंड का सीमा क्षेत्र

  • नेता: स्थानीय आदिवासी नेता (राजा जगन्नाथ सिंह आदि)

  • कारण:

    • अंग्रेजों की कर नीति और जंगल अधिकारों का हनन

  • विशेषता:

    • यह विद्रोह कई चरणों में हुआ और व्यापक हिंसा हुई।


📌 मुख्य कारणों का सारांश:

क्षेत्र प्रमुख कारण
कृषक भू-कर की कठोरता, नकदी फसलों की जबरदस्ती, कर्ज में फँसना, महाजनों का शोषण
आदिवासी जंगल अधिकारों का हनन, दिकुओं का आगमन, पारंपरिक शासन प्रणाली का अंत, सांस्कृतिक हस्तक्षेप

📝 निष्कर्ष:

1857 से पहले भारत में किसानों और आदिवासियों द्वारा किए गए आंदोलन ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जन आक्रोश के जीवंत उदाहरण हैं। ये आंदोलन यद्यपि संगठित नहीं थे, फिर भी उन्होंने जन-जागृति का मार्ग प्रशस्त किया। इन संघर्षों ने भारतीय जनता में स्वतंत्रता की भावना को जन्म दिया और 1857 की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के लिए मानसिक व सामाजिक आधार तैयार किया।





प्रश्न 3: 1857 ई० के पश्चात् चले किसान आन्दोलनों का संक्षिप्त वर्णन करें।

Answer

परिचय:

1857 की क्रांति के बाद भी ब्रिटिश सरकार की नीतियों में किसानों के हित में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ। भारी भू-कर, शोषणकारी जमींदारी प्रथा, महाजनों की लूट, और खेती-किसानी पर बढ़ते संकट के कारण किसानों में असंतोष बढ़ता गया। इसका परिणाम यह हुआ कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में किसान आंदोलन होने लगे। ये आंदोलन किसानों के आर्थिक, सामाजिक, और राजनीतिक अधिकारों की माँग को लेकर हुए।


🔥 1857 के पश्चात् प्रमुख किसान आंदोलनों का संक्षिप्त वर्णन:

आंदोलन वर्ष क्षेत्र कारण / विशेषता
नील विद्रोह 1859-60      बंगाल किसानों को नील की खेती के लिए मजबूर किया जाता था। उचित दाम नहीं मिलते थे।

पबना आंदोलन 1873-76 पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) जमींदारों द्वारा अवैध वसूली और बेदखली के खिलाफ किसानों ने सत्याग्रह किया।

दक्कन दंगे 1875 पुणे और अहमदनगर (महाराष्ट्र) साहूकारों द्वारा कर्ज वसूली के अत्याचार, किसानों ने दस्तावेज़ नष्ट किए।

बर्धोली सत्याग्रह 1928 गुजरात वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में भूमि कर में वृद्धि के खिलाफ आंदोलन।

एक्का आंदोलन 1921-22 अवध (उत्तर प्रदेश) मुसलमान और दलित किसानों ने मिलकर ज़मींदारों के खिलाफ विद्रोह किया।

चंपारण सत्याग्रह 1917 बिहार गांधीजी का पहला आंदोलन, नील की जबरन खेती के खिलाफ।

खेड़ा आंदोलन 1918 गुजरात अकाल के बावजूद कर वसूली, गांधीजी के नेतृत्व में आंदोलन।

मोपला विद्रोह 1921 केरल (मालाबार) मुस्लिम किसानों द्वारा जमींदारों और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष।

तेलंगाना आंदोलन 1946-51 हैदराबाद राज्य सामंती शोषण, लगान और अत्याचार के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह।
तिभागा आंदोलन 1946-47 बंगाल बंटाईदारों (किसानों) ने पैदावार का तीन चौथाई हिस्सा माँगा।

📌 इन आंदोलनों की विशेषताएँ:

  1. अधिकतर आंदोलन स्थानीय स्तर पर थे, लेकिन किसानों की एकजुटता दर्शाते थे।

  2. बिना हथियारों के अहिंसक आंदोलन भी हुए (जैसे – चंपारण, खेड़ा)।

  3. कुछ आंदोलन राजनीतिक रूप से प्रेरित थे, जैसे कि कांग्रेस या वामपंथी दलों का सहयोग।

  4. किसानों ने महाजनों, जमींदारों, और सरकार – तीनों से संघर्ष किया।

  5. कई आंदोलनों में महिलाओं और दलितों की भी सक्रिय भागीदारी रही।


📝 निष्कर्ष:

1857 के बाद किसानों ने अपने अधिकारों और सम्मान के लिए ब्रिटिश सरकार और सामंती शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाई। इन आंदोलनों ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को आर्थिक और सामाजिक आधार दिया तथा गांधीजी जैसे नेताओं को किसानों से जोड़कर जन आंदोलन का स्वरूप दिया। इन संघर्षों ने भारतीय लोकतंत्र की नींव मजबूत की।





प्रश्न:

20वीं शताब्दी के प्रमुख किसान आन्दोलनों के बारे में आप क्या जानते हैं?

Answer


परिचय:

भारत में 20वीं शताब्दी के किसान आंदोलन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण रहे। इस समय किसानों ने केवल जमींदारों और साहूकारों के शोषण के खिलाफ ही नहीं, बल्कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन और बाद में स्वतंत्र भारत की नीतियों के विरोध में भी संघर्ष किया। इन आंदोलनों ने भारत के राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम को जन-आधार प्रदान किया।


🔥 20वीं शताब्दी के प्रमुख किसान आंदोलन:

आंदोलन वर्ष क्षेत्र नेतृत्व / विशेषता
चंपारण सत्याग्रह 1917 बिहार महात्मा गांधी का पहला आंदोलन, नील की जबरन खेती के विरुद्ध

खेड़ा आंदोलन 1918 गुजरात गांधीजी, सरदार पटेल – अकाल के बावजूद कर वसूली का विरोध
अहमदाबाद मिल हड़ताल 1918 गुजरात गांधीजी के नेतृत्व में, श्रमिकों का वेतन बढ़ाने की माँग
बर्धोली सत्याग्रह 1928 गुजरात सरदार पटेल के नेतृत्व में, भूमि कर में वृद्धि का विरोध

मोपला विद्रोह 1921 केरल (मालाबार) मुस्लिम किसानों द्वारा जमींदारों और अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष
एक्का आंदोलन 1921-22 अवध किसान-मजदूर एकता, ऊँच-नीच के विरुद्ध और लगान के विरोध में
किसान सभा आंदोलन 1936  पूरे भारत में ऑल इंडिया किसान सभा की स्थापना, वामपंथी नेताओं का प्रभाव
तिभागा आंदोलन 1946-47 बंगाल बंटाईदार किसानों ने फसल का तीन-चौथाई हिस्सा माँगा

तेलंगाना किसान आंदोलन
1946-51 हैदराबाद राज्य निजाम, जमींदारों और अंग्रेजी शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष
पावनार आंदोलन 1930 के दशक महाराष्ट्र गांधीवादी विचारधारा पर आधारित, ग्राम स्वराज की माँग

📌 इन आंदोलनों की प्रमुख विशेषताएँ:

  1. गांधीजी का प्रभाव – कई किसान आंदोलन अहिंसक और सत्याग्रह आधारित थे।

  2. राजनीतिक चेतना का विकास – किसान अब केवल आर्थिक नहीं, राजनीतिक अधिकारों की भी माँग करने लगे।

  3. महिलाओं की भागीदारी – कई आंदोलनों में महिलाओं की सक्रिय उपस्थिति थी।

  4. वामपंथी संगठनों की भूमिका – खासकर 1930 के बाद किसान सभा जैसे संगठनों ने बड़ा नेतृत्व किया।

  5. राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ाव – अधिकतर किसान आंदोलन स्वतंत्रता संग्राम से सीधे जुड़े हुए थे।


📝 निष्कर्ष:

20वीं शताब्दी के किसान आंदोलन केवल आर्थिक शोषण के विरुद्ध नहीं थे, बल्कि वे भारतीय समाज की चेतना, सामाजिक न्याय, और राजनीतिक स्वतंत्रता के पक्ष में एक बड़ी आवाज़ बनकर उभरे। इन आंदोलनों ने भारत की स्वतंत्रता की नींव को मजबूत किया और स्वतंत्र भारत में किसान आंदोलन की परंपरा को आगे बढ़ाया।



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