B.A 2 Year 3 Semester Indian National Congress (INC) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस in Hindi

 Indian National Congress (INC) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस




Question (1)
भारत में राष्ट्रीय जागृति के कारण बताओ।
Answer

भारत में राष्ट्रीय जागृति (National Awakening) 19वीं सदी के उत्तरार्ध में शुरू हुई एक ऐतिहासिक प्रक्रिया थी, जिसने भारतीयों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ संगठित होने, अपनी राष्ट्र की भावना को पहचानने और स्वतंत्रता की आवश्यकता को समझने की प्रेरणा दी।

यह जागृति अचानक नहीं हुई, बल्कि इसके पीछे कई राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक कारण थे।


   ✅ भारत में राष्ट्रीय जागृति के प्रमुख कारण


  🔴 1. ब्रिटिश शासन की शोषणकारी नीतियाँ

  • अंग्रेजों की आर्थिक, राजनीतिक और प्रशासनिक नीतियों ने भारतीय समाज को बुरी तरह से प्रभावित किया।

  • किसानों, कारीगरों और व्यापारियों का जीवन संकट में आ गया।

  • यह महसूस किया गया कि अंग्रेजी शासन भारतीयों के हित में नहीं, बल्कि अपने लाभ के लिए है।


  🔵 2. 1857 के विद्रोह का प्रभाव

  • 1857 का विद्रोह भले ही असफल रहा, लेकिन इसने लोगों को यह एहसास कराया कि अंग्रेजों को चुनौती दी जा सकती है।

  • इसके बाद भारतीयों में राष्ट्रभक्ति और एकता की भावना का जन्म हुआ।


   🟢 3. शिक्षा और प्रेस का विकास

  • अंग्रेजों ने आधुनिक शिक्षा की शुरुआत की, जिससे एक नया शिक्षित वर्ग तैयार हुआ।

  • इस वर्ग ने भारतीयों को उनके अधिकारों और राष्ट्रवाद के बारे में जागरूक किया।

  • समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और पुस्तकों ने राष्ट्रीय चेतना फैलाने में अहम भूमिका निभाई।


  🟣 4. भारतीय पुनर्जागरण और समाज सुधार आंदोलन

  • राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानंद, दयानंद सरस्वती, ईश्वर चंद्र विद्यासागर जैसे नेताओं ने सामाजिक बुराइयों के खिलाफ संघर्ष किया।

  • इन आंदोलनों ने भारतीयों में स्वाभिमान, आत्मगौरव और स्वतंत्र सोच को जन्म दिया।


  🟠 5. रेल, डाक और टेलीग्राफ का विस्तार

  • इन साधनों ने लोगों को एक-दूसरे से जोड़ा, विचारों का आदान-प्रदान आसान हुआ।

  • इससे देशभर में एकता की भावना और विचारधारा का प्रसार हुआ।


  🟡 6. भारतीयों के साथ भेदभाव

  • अंग्रेज़ भारतीयों के साथ नस्लीय भेदभाव करते थे — प्रशासन, सेना, न्याय और शिक्षा में भी।

  • इससे लोगों में असंतोष और एकता की भावना और अधिक बढ़ी।


  🔴 7. भारतीय नेताओं और संस्थाओं का उदय

  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885) की स्थापना ने एक राष्ट्रीय मंच प्रदान किया।

  • धीरे-धीरे कांग्रेस और अन्य संगठनों के माध्यम से लोगों को स्वतंत्रता की मांग के लिए संगठित किया जाने लगा।


 🔵 8. वैश्विक घटनाओं का प्रभाव

  • दुनिया भर में हो रहे लोकतांत्रिक आंदोलनों (जैसे फ्रांस, अमेरिका) ने भारतीयों को प्रेरित किया।

  • जापान द्वारा रूस को हराना (1905) ने दिखाया कि एक एशियाई देश भी यूरोपीय शक्ति को हरा सकता है


 🔚 निष्कर्ष:

भारत में राष्ट्रीय जागृति एक धीरे-धीरे विकसित होने वाली प्रक्रिया थी, जो कई सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक कारकों का परिणाम थी।
इस जागृति ने भारत में स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखी और आने वाले वर्षों में महात्मा गांधी जैसे नेताओं के नेतृत्व में यह एक संगठित जनआंदोलन बन गया।



Question (2)
प्रैजीडैसी नगरों में प्रारम्भिक राजनीतिक संस्थाओं के कार्यों तथा योगदान के बारे में बताओ।
Answer

प्रेसीडेंसी नगरों (Presidency Towns) — बंबई (अब मुंबई), मद्रास (अब चेन्नई), और कलकत्ता (अब कोलकाता) — भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान राजनीतिक जागरूकता और राष्ट्रीय चेतना के प्रमुख केंद्र बने।
यहाँ पर 19वीं सदी के उत्तरार्ध में अनेक प्रारंभिक राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना हुई, जिन्होंने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की बुनियाद तैयार की


  ✅ प्रेसीडेंसी नगरों में प्रारंभिक राजनीतिक संस्थाएँ और उनका योगदान


   🟢 1. बंगाल (कलकत्ता) – राजनीतिक संस्थाएँ और योगदान

  🔹 बंगाल ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन (1851)

  •  स्थापना: राजा राधाकांत देव और देवेंद्रनाथ टैगोर ने की।

  • उद्देश्य: ब्रिटिश शासन में भारतीयों के हितों की रक्षा करना।

  • योगदान:

    • भूमि कर, शिक्षा और प्रशासन से जुड़ी समस्याओं को ब्रिटिश संसद में उठाया।

    • प्रारंभिक राजनीतिक चेतना का विकास किया।

  🔹 इंडियन लीग (1875)

  • संस्थापक: शिशिर कुमार घोष।

  • उद्देश्य: मध्यम वर्ग को राजनीतिक दृष्टि से जागरूक बनाना।

   🔹 इंडियन एसोसिएशन (1876)

  • संस्थापक: सुरेंद्रनाथ बनर्जी और आनंदमोहन बोस।

  • योगदान:

    • ब्रिटिश संसद में भारतीयों के प्रतिनिधित्व की माँग की।

    • राजनीतिक सभाओं और आंदोलनों का आयोजन कर जनता को जागरूक किया।


   🔵 2. बंबई (मुंबई) – राजनीतिक संस्थाएँ और योगदान

   🔹 बॉम्बे एसोसिएशन (1852)

  • संस्थापक: जगन्नाथ शंकरशेठ, भौमजी दामोदर, नौरोजी फु्रंज़ी।

  • उद्देश्य: भारतीयों के सामाजिक-राजनीतिक हितों की रक्षा करना।

  • योगदान:

    • सरकार को ज्ञापन देकर शिक्षा, कर और न्याय से जुड़ी माँगें रखीं।

  🔹 पूना सार्वजनिक सभा (Poona Sarvajanik Sabha – 1870)

  • संस्थापक: एम.जी. रणाडे और गोपाल कृष्ण गोखले।

  • योगदान:

    • किसानों और आम लोगों की समस्याओं को उठाया।

    • ब्रिटिश शासन को सुधारात्मक सुझाव दिए।


  🔴 3. मद्रास (चेन्नई) – राजनीतिक संस्थाएँ और योगदान

  🔹 मद्रास नेटिव एसोसिएशन (1843)

  • यह भारत की सबसे प्राचीन राजनीतिक संस्था मानी जाती है।

  • संस्थापक: जी.एस. अरुंदेलु और अन्य शिक्षित दक्षिण भारतीय नेता।

  • योगदान:

    • स्थानीय प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी की माँग की।

  🔹 मद्रास महाजन सभा (1884)

  • संस्थापक: एम. वीरराघवाचारी, जी. सुब्रमण्यम अय्यर, और पी. आनंदचार्लु।

  • उद्देश्य: जनहित के मुद्दों को अंग्रेजों के सामने रखना।

  • योगदान:

    • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


   🌟 इन संस्थाओं का समग्र योगदान:

क्षेत्र योगदान
✳ राजनीतिक चेतना                    जनता में ब्रिटिश शासन की नीतियों के प्रति जागरूकता फैलाई।
✳ जन भागीदारी                    पहली बार आम नागरिकों को राजनीति से जोड़ने का कार्य किया।
✳ कांग्रेस की नींव             इन संस्थाओं ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885) की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।
✳ ब्रिटिश विरोध                    ब्रिटिश नीतियों की आलोचना कर, सुधारों की माँग करना शुरू किया।

   🔚 निष्कर्ष:

प्रेसीडेंसी नगरों की प्रारंभिक राजनीतिक संस्थाओं ने भारत में राष्ट्रीय जागरूकता और राजनीतिक आंदोलन की नींव रखी।
ये संस्थाएँ भले ही शुरुआती दौर में संवैधानिक सुधारों और शांति पूर्ण ज्ञापनों तक सीमित थीं, परंतु इनकी भूमिका भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रही।





Question (3)
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना तथा इसके मुख्य उद्देश्यों के बारे में वर्णन करो।
Answer

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण और संगठित चरण भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress - INC) की स्थापना के साथ आरंभ होता है। इसकी स्थापना भारत में राष्ट्रीय चेतना को एक मंच पर लाकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक संघर्ष के रूप में की गई थी।


   ✅ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885)

  🔷 स्थापना कब हुई?

  • दिनांक: 28 दिसंबर 1885

  • स्थान: गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज, बंबई (अब मुंबई)

   🔷 संस्थापक कौन थे?

  • ए. ओ. ह्यूम (A. O. Hume) — एक सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारी, जिन्होंने भारतीय नेताओं को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई।

  🔷 प्रथम अधिवेशन (Session)

  • अध्यक्ष: व्योमेश चंद्र बनर्जी

  • प्रतिभागी: 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया

  • मुख्य उद्देश्य: भारतीयों को राजनीतिक रूप से जागरूक करना और उन्हें एक राष्ट्रीय मंच प्रदान करना।


  🎯 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख उद्देश्य (प्रारंभिक काल में)

   1. 🟢 राजनीतिक चेतना का विकास

  • भारतीय जनता को राजनीतिक अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना।

   2. 🔵 ब्रिटिश सरकार से संवाद

  • भारतीयों की समस्याओं और मांगों को शांतिपूर्ण ढंग से ब्रिटिश सरकार तक पहुँचाना

   3. 🟡 राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना

  • भारत के विभिन्न धर्मों, जातियों, भाषाओं और क्षेत्रों के लोगों को एक राष्ट्र की भावना से जोड़ना।

    4. 🟣 प्रशासनिक सुधारों की माँग

  • भारतीयों को सरकारी नौकरियों, विधान परिषदों और प्रशासन में उचित स्थान दिलाने की माँग।

   5. 🔴 सामाजिक सुधार को समर्थन

  • बाल विवाह, सती प्रथा, स्त्री-शिक्षा जैसे मुद्दों पर सुधारवादी रुख अपनाना।


📌 प्रारंभिक कांग्रेस की विशेषताएँ (1885–1905 तक)

विशेषता विवरण
     नीति संविधानिक सुधार, ब्रिटिश शासन में रहकर सुधार की नीति
  नेतृत्व मध्यम वर्ग, शिक्षित वर्ग द्वारा नेतृत्व
   भाषा इंग्लिश व भारतीय भाषाओं में कार्य
आंदोलन की शैली        निवेदन, ज्ञापन, याचिका (Prayer, Petition, Protest)

  🔚 निष्कर्ष:

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को एक संगठित दिशा दी।
हालांकि प्रारंभिक उद्देश्य केवल सुधार और प्रतिनिधित्व तक सीमित थे, लेकिन आगे चलकर कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज (Complete Independence) की माँग करते हुए एक जन आंदोलन का रूप धारण कर लिया।




Question (4)
1885 से 1905 ई० तक कांग्रेस का राष्ट्रीय आन्दोलन में क्या योगदान था ? अंग्रेज़ सरकार के प्रति इसका रवैय्या कैसा था ?
Answer

1885 से 1905 ई० तक का समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) के इतिहास में "उदारवादी युग" (Moderate Phase) कहलाता है। इस दौर में कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन के प्रति नम्र, संवैधानिक और सुधारवादी नीति अपनाई और संवैधानिक मार्ग से सुधार लाने का प्रयास किया।


1885 से 1905 ई० तक कांग्रेस का राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान


🔷 1. राजनीतिक चेतना का प्रसार

  • कांग्रेस ने देशभर में राजनीतिक जागरूकता फैलाने का कार्य किया।

  • पहली बार आम भारतीयों को यह बताया गया कि राजनीतिक अधिकार भी नागरिक अधिकार होते हैं।


🔷 2. ब्रिटिश संसद और सरकार को ज्ञापन भेजना

  • कांग्रेस नेताओं ने ब्रिटिश संसद और प्रशासन को ज्ञापन (Memorandum), याचिकाएँ (Petitions) भेजकर भारतीयों की मांगें रखीं।


🔷 3. एक अखिल भारतीय मंच की स्थापना

  • कांग्रेस ने भारत के विभिन्न प्रांतों, जातियों, भाषाओं और धर्मों के लोगों को एक राष्ट्रवादी मंच पर लाने का कार्य किया।

  • इससे भारतीयों में राष्ट्रीय एकता की भावना का विकास हुआ।


🔷 4. प्रशासनिक सुधारों की माँग

  • कांग्रेस ने निम्नलिखित सुधारों की माँग की:

    • विधान परिषदों का विस्तार

    • भारतीयों को उच्च प्रशासनिक पदों पर नियुक्त करना

    • सेना में व्यय में कटौती

    • शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार


🔷 5. आर्थिक शोषण के विरुद्ध आवाज़

  • दादाभाई नैरोजी ने भारत से ब्रिटिश पूँजी के बाहर जाने को "धन-निष्कासन सिद्धांत (Drain of Wealth Theory)" के रूप में प्रस्तुत किया।

  • कांग्रेस ने इस आर्थिक शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाई।


🟥 अंग्रेज़ सरकार के प्रति कांग्रेस का रवैया (1885–1905)

तत्व विवरण
🔵 नीति   "प्रार्थना, याचिका और विरोध" (Prayer, Petition, Protest)
🔵 दृष्टिकोण   कांग्रेस का मानना था कि अंग्रेज सुधार करेंगे अगर उन्हें सही तरीके से समझाया जाए।
🔵 रवैया   नम्र, सुधारवादी और संवैधानिक – कोई उग्र आंदोलन नहीं किया गया।
🔵 भरोसा   कांग्रेस नेताओं को ब्रिटिश न्यायप्रियता पर पूरा भरोसा था। वे इसे "सभ्य शासन" मानते थे।

🧑‍🏫 प्रमुख उदारवादी नेता (Moderate Leaders)

नेता का नाम प्रमुख योगदान
दादाभाई नैरोजी Drain of Wealth सिद्धांत, ब्रिटिश संसद के सदस्य बने
गोपाल कृष्ण गोखले      समाज सेवा, शिक्षा सुधार
सुरेन्द्रनाथ बनर्जी भाषणों और लेखों से राजनीतिक चेतना का प्रसार
फिरीशाह मेहता कांग्रेस के संगठन को मजबूत किया

🔚 निष्कर्ष:

1885 से 1905 तक, कांग्रेस ने भारत में राष्ट्रीय आंदोलन की नींव रखी
हालांकि यह दौर संवैधानिक और शांति-प्रिय रहा, लेकिन इसने राजनीतिक शिक्षा, राष्ट्रीयता और जन-जागरण की एक ऐसी लहर चलाई, जिसने आगे चलकर गरम दल (1905 के बाद) को जन्म दिया।




Question (5)
उदारवादियों के 1885 से 1905 ई० तक अपनाये गये तरीकों तथा कार्य-विधि की चर्चा करो।
Answer

1885 से 1905 ई. तक का काल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) में "उदारवादियों" (Moderates) का युग कहलाता है।
इस काल में कांग्रेस पर ऐसे नेताओं का प्रभाव था जो ब्रिटिश शासन के प्रति नम्र, संवैधानिक और सुधारवादी दृष्टिकोण रखते थे।

उदारवादियों द्वारा अपनाए गए तरीके तथा कार्य-विधियाँ (1885–1905)


🔷 1. संवैधानिक और शांतिपूर्ण उपायों पर बल

  • उदारवादियों ने हमेशा कानूनी, अहिंसक और शांतिपूर्ण तरीकों को अपनाया।

  • उनका विश्वास था कि ब्रिटिश सरकार सुधार के लिए तैयार है, यदि उसे तर्कों और आंकड़ों से समझाया जाए।


🔷 2. प्रार्थना, याचिका और विरोध (Three P’s)

  • उनकी मुख्य कार्य-पद्धति थी:

    1. प्रार्थना (Prayer) – सरकार से अनुरोध करना

    2. याचिका (Petition) – मांगों को पत्रों और ज्ञापनों के माध्यम से पेश करना

    3. विरोध (Protest) – कानून और व्यवस्था के दायरे में रहकर असहमति व्यक्त करना


🔷 3. ब्रिटिश संसद और जनता को प्रभावित करना

  • उदारवादी नेताओं ने ब्रिटेन की संसद, प्रेस और जनता को भारतीयों की स्थिति से अवगत कराने की कोशिश की।

  • दादाभाई नैरोजी स्वयं ब्रिटिश संसद में सदस्य बने और भारतीयों के हितों की बात उठाई।


🔷 4. जनता में राजनीतिक शिक्षा का प्रसार

  • इन नेताओं ने भाषण, लेख और सभाओं के माध्यम से भारतीय जनता को राजनीतिक रूप से जागरूक किया।

  • राष्ट्रीयता, नागरिक अधिकारों और प्रतिनिधित्व की भावना का विकास किया।


🔷 5. सुधारों की माँग

  • प्रशासनिक सुधार (लॉर्ड रिपन जैसे उदार गवर्नरों का समर्थन)

  • विधायी परिषदों का विस्तार

  • भारतीयों को उच्च प्रशासनिक पदों पर नियुक्ति

  • शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार

  • न्यायिक भेदभाव समाप्त करने की माँग


🔷 6. आर्थिक शोषण के विरुद्ध आवाज़

  • "धन-निष्कासन सिद्धांत" (Drain of Wealth Theory) का प्रचार किया — जिसे दादाभाई नैरोजी ने स्थापित किया।

  • भारत की गरीबी को ब्रिटिश आर्थिक नीतियों का परिणाम बताया।


🧑‍🏫 प्रमुख उदारवादी नेता और उनके योगदान

नेता योगदान
दादाभाई नैरोजी 'पावर्टी एंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया' पुस्तक, Drain Theory
गोपाल कृष्ण गोखले न्यायप्रिय सुधारक, समाज सुधार
सुरेन्द्रनाथ बनर्जी भाषणों और लेखों से जन-जागरण
फिरीशाह मेहता कांग्रेस के संगठन को मजबूत किया

🟠 उदारवादियों की सीमाएँ

  • उन्होंने जनता को संगठित आंदोलन के लिए प्रेरित नहीं किया।

  • ब्रिटिश न्याय प्रणाली पर अंधविश्वास रखा।

  • उनके आंदोलनों का असर मुख्य रूप से शहरी शिक्षित वर्ग तक ही सीमित रहा।

  • अंग्रेज़ों ने उनकी मांगों को अक्सर नजरअंदाज किया।


🔚 निष्कर्ष:

उदारवादियों (Moderates) ने 1885 से 1905 तक भारत में राजनीतिक चेतना फैलाने, राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने, और ब्रिटिश सरकार से संवैधानिक सुधारों की माँग करने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
हालांकि उनके शांतिपूर्ण और विनम्र तरीकों की सीमाएँ थीं, परन्तु उनका योगदान भारत के राष्ट्रीय आंदोलन की नींव रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।



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