Judiciary-supreme Court and High Courts: Jurisdiction
Question 1. सर्वोच्च न्यायालय के संगठन का वर्णन कीजिए।
सर्वोच्च न्यायालय के संगठन का वर्णन
सर्वोच्च न्यायालय भारत का सर्वोच्च न्यायिक निकाय है और भारतीय संविधान के अंतर्गत अंतिम अपीलीय न्यायालय है। यह न्यायपालिका की सबसे ऊँची संस्था है। इसका संगठन निम्नलिखित भागों में होता है:
1. भारत के प्रधान न्यायाधीश (Chief Justice of India - CJI)
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सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख होते हैं।
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इनकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
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ये न्यायालय के प्रशासन, मामलों के वितरण और पीठों (Benches) के गठन का कार्य देखते हैं।
2. अन्य न्यायाधीश
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संविधान के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश सहित अधिकतम 34 न्यायाधीश हो सकते हैं।
-
इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश और अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों से परामर्श करके की जाती है (जिसे कोलेजियम प्रणाली कहा जाता है)।
3. पीठों (Benches) का गठन
सर्वोच्च न्यायालय विभिन्न प्रकार की पीठों के माध्यम से कार्य करता है:
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संविधान पीठ (Constitution Bench):
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इसमें पाँच या अधिक न्यायाधीश होते हैं।
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यह संविधान से संबंधित महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई करती है (अनुच्छेद 145(3) के अनुसार)।
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खंडपीठ (Division Bench):
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इसमें दो या तीन न्यायाधीश होते हैं।
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सामान्य अपीलों, याचिकाओं आदि की सुनवाई करती है।
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एकल पीठ (Single Judge Bench):
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सर्वोच्च न्यायालय में इसका उपयोग बहुत कम होता है, केवल प्रक्रियात्मक मामलों में।
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4. रजिस्ट्री (Registry)
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यह न्यायालय की प्रशासनिक इकाई होती है।
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इसका प्रमुख सचिव-जनरल (Secretary-General) होता है।
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यह मामले दाखिल करने, सूची बनाने, नोटिस जारी करने और रिकॉर्ड संभालने जैसे कार्य करता है।
5. न्यायालय अधिकारी एवं कर्मचारी
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इसमें रजिस्ट्रार, डिप्टी रजिस्ट्रार, कोर्ट मास्टर, क्लर्क आदि शामिल होते हैं, जो न्यायालय के दैनिक कार्यों में सहायता करते हैं।
6. बार (Bar) या अधिवक्ता मंडल
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इसमें रिकॉर्ड पर अधिवक्ता (Advocates-on-Record) और वरिष्ठ अधिवक्ता (Senior Advocates) शामिल होते हैं।
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केवल रिकॉर्ड पर अधिवक्ता ही सर्वोच्च न्यायालय में मामले दायर करने के लिए अधिकृत होते हैं।
निष्कर्ष:
सर्वोच्च न्यायालय का संगठन ऐसा है कि यह न केवल देश की न्याय व्यवस्था की सर्वोच्च संस्था के रूप में कार्य करता है, बल्कि यह संविधान की रक्षा और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करता है।
Question सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति, योग्यता, कार्यकाल एवं हटाने की विधि लिखिए।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति, योग्यता, कार्यकाल एवं हटाने की विधि
1. नियुक्ति (Appointment)
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मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India - CJI) की नियुक्ति:
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भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
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परंपरा के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जाता है।
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अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति:
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राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
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मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों के परामर्श (Collegium System) से।
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2. योग्यता (Qualifications)
सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ आवश्यक हैं (अनुच्छेद 124(3)):
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भारत का नागरिक होना चाहिए।
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निम्न में से कोई एक शर्त पूरी करनी चाहिए:
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किसी उच्च न्यायालय में कम से कम 5 वर्ष तक न्यायाधीश रहा हो, या
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उच्च न्यायालय में कम से कम 10 वर्ष तक अधिवक्ता रहा हो, या
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राष्ट्रपति की राय में विधि का विशिष्ट ज्ञाता (Distinguished Jurist) हो।
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3. कार्यकाल (Tenure)
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सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष निर्धारित है।
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न्यायाधीश चाहे तो कार्यकाल पूरा होने से पहले स्वेच्छा से इस्तीफा दे सकता है (राष्ट्रपति को लिखित पत्र द्वारा)।
4. हटाने की विधि (Removal Process / Impeachment)
न्यायाधीश को केवल गंभीर कदाचार या अक्षमता के आधार पर हटाया जा सकता है (अनुच्छेद 124(4))।
हटाने की प्रक्रिया:
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संसद के किसी एक सदन में कम से कम 100 (लोकसभा) या 50 (राज्यसभा) सदस्य एक प्रस्ताव (motion) लाते हैं।
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प्रस्ताव को दोनों सदनों में विशेष बहुमत (Special Majority) से पारित करना होता है:
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उपस्थित और मतदान कर रहे सदस्यों का बहुमत, और
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सदन की कुल सदस्य संख्या का दो-तिहाई बहुमत।
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इसके बाद राष्ट्रपति द्वारा न्यायाधीश को पद से हटाया जा सकता है।
🔹 इस प्रक्रिया को Impeachment कहते हैं।
निष्कर्ष:
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति, योग्यता, कार्यकाल और हटाने की प्रक्रिया भारतीय संविधान द्वारा निर्धारित की गई है, जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके।
Question 2. सर्वोच्च न्यायालय की प्रारंभिक एवं अपीलीय अधिकारिता लिखिए।
2. सर्वोच्च न्यायालय की प्रारंभिक एवं अपीलीय अधिकारिता
सर्वोच्च न्यायालय भारत का सर्वोच्च न्यायिक निकाय है और इसे भारतीय संविधान के अंतर्गत विभिन्न प्रकार की अधिकारिता (Jurisdiction) प्राप्त है। इनमें से दो प्रमुख हैं: प्रारंभिक (Original) और अपीलीय (Appellate) अधिकारिता।
🔷 1. प्रारंभिक अधिकारिता (Original Jurisdiction)
अर्थ:
इस अधिकारिता के अंतर्गत वे मामले आते हैं जो प्रत्यक्ष रूप से सर्वोच्च न्यायालय में ही दायर किए जा सकते हैं, न कि किसी निम्न न्यायालय में।
संविधान के अनुच्छेद 131 के अंतर्गत यह अधिकारिता प्राप्त है।
मुख्य बिंदु:
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केंद्र और एक या अधिक राज्यों के बीच विवाद।
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दो या दो से अधिक राज्यों के बीच विवाद।
-
केंद्र और राज्य के बीच विवाद (यदि विषय कानूनी अधिकारों से संबंधित हो)।
अन्य प्रारंभिक अधिकारिता:
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मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में व्यक्ति सीधे सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका (अनुच्छेद 32) के तहत आवेदन कर सकता है।
-
निर्वाचन संबंधी विवाद जैसे राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव की वैधता पर सुनवाई।
🔷 2. अपीलीय अधिकारिता (Appellate Jurisdiction)
अर्थ:
इस अधिकारिता के अंतर्गत उच्च न्यायालयों से आए अपीलों की सुनवाई होती है। यह सर्वोच्च न्यायालय का प्रमुख कार्य है।
तीन प्रकार की अपीलीय अधिकारिता:
(क) संवैधानिक अपील (Constitutional Appeal)
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जब किसी उच्च न्यायालय की पीठ ने कोई संवैधानिक प्रश्न तय किया हो, तो उसके विरुद्ध अपील की जा सकती है।
(ख) दीवानी अपील (Civil Appeal)
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उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध यदि वह मामला प्रमुख कानूनी मुद्दे से जुड़ा हो और संबंधित उच्च न्यायालय प्रमाणपत्र (Certificate) दे, तो अपील की जा सकती है।
(ग) दंडात्मक अपील (Criminal Appeal)
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यदि:
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उच्च न्यायालय ने किसी व्यक्ति को बरी कर दोषी ठहराया हो, या
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मृत्युदंड दिया हो, या
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वह मामला महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न से जुड़ा हो।
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निष्कर्ष:
| प्रकार | अधिकारिता | उदाहरण |
|---|---|---|
| प्रारंभिक | प्रत्यक्ष रूप से सर्वोच्च न्यायालय में दायर मामला | राज्य बनाम राज्य विवाद, अनुच्छेद 32 की याचिका |
| अपीलीय | उच्च न्यायालयों के निर्णय के विरुद्ध अपील | दीवानी, दंडात्मक, संवैधानिक अपीलें |
सर्वोच्च न्यायालय की ये दोनों अधिकारिताएँ इसे भारत का न्यायिक प्रहरी (Judicial Guardian) बनाती हैं, जो संविधान और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है।
Question 3. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य कार्य/शक्तियाँ लिखिए।
3. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य कार्य / शक्तियाँ
सर्वोच्च न्यायालय भारत की न्यायपालिका की सर्वोच्च संस्था है। संविधान द्वारा इसे विभिन्न प्रकार की शक्तियाँ और कार्य सौंपे गए हैं, जिनका उद्देश्य न्याय व्यवस्था को प्रभावी, निष्पक्ष और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप बनाए रखना है।
🔷 सर्वोच्च न्यायालय की मुख्य शक्तियाँ एवं कार्य:
1. संवैधानिक व्याख्या करना (Interpretation of the Constitution)
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संविधान के अनुच्छेदों की व्याख्या करने का अंतिम अधिकार सर्वोच्च न्यायालय के पास है।
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यह किसी भी कानून या सरकारी आदेश की संवैधानिकता की जांच कर सकता है।
2. मौलिक अधिकारों की रक्षा करना
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यदि किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो वह अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर सकता है।
-
यह अधिकार स्वयं संविधान द्वारा "मौलिक अधिकार" के रूप में सुनिश्चित किया गया है।
3. मूल अधिकारिता का प्रयोग (Original Jurisdiction)
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राज्यों और केंद्र के बीच या दो राज्यों के बीच विवादों की सुनवाई (अनुच्छेद 131)।
-
राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए विधिक प्रश्नों पर परामर्श देना (अनुच्छेद 143)।
4. अपीलीय अधिकारिता (Appellate Jurisdiction)
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दीवानी, दंडात्मक और संवैधानिक मामलों में उच्च न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध अपील सुनना।
5. विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition - SLP)
-
अनुच्छेद 136 के अंतर्गत, सर्वोच्च न्यायालय किसी भी न्यायालय या न्यायाधिकरण के निर्णय के विरुद्ध विशेष अनुमति से अपील सुन सकता है।
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यह शक्ति न्यायालय को अत्यधिक लचीलापन और विवेक प्रदान करती है।
6. न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review)
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यह किसी भी कानून, आदेश या नीति की संवैधानिकता की समीक्षा कर सकता है।
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असंवैधानिक पाए जाने पर वह कानून निरस्त (Invalid) कर सकता है।
7. प्रक्रियात्मक न्याय (Due Process of Law)
-
सभी मामलों में निष्पक्षता, न्याय और उचित प्रक्रिया का पालन कराना।
8. लोकहित याचिका (Public Interest Litigation - PIL) स्वीकार करना
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गरीब, असहाय या सामूहिक हितों से जुड़े मामलों में कोई भी नागरिक न्यायालय में PIL दायर कर सकता है।
-
इससे सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिलता है।
9. राष्ट्रपति को परामर्श देना
-
राष्ट्रपति, अनुच्छेद 143 के तहत किसी विधिक प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांग सकता है।
🔶 निष्कर्ष:
सर्वोच्च न्यायालय न केवल एक न्यायिक संस्था है, बल्कि यह संविधान का रक्षक, नागरिकों के अधिकारों का प्रहरी, और केंद्र एवं राज्य के बीच संतुलन स्थापित करने वाली संस्था भी है। इसकी शक्तियाँ भारतीय लोकतंत्र की न्यायिक स्वतंत्रता और कानून के शासन को सुनिश्चित करती हैं।
Question 4. राज्य उच्च न्यायालय के संगठन का वर्णन कीजिए।
4. राज्य उच्च न्यायालय के संगठन का वर्णन
उच्च न्यायालय (High Court) किसी राज्य या राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के समूह की सर्वोच्च न्यायिक संस्था होती है। यह राज्य स्तर पर न्यायपालिका का नेतृत्व करता है और भारत के संविधान के अंतर्गत स्थापित किया गया है।
🔷 उच्च न्यायालय का संगठन:
उच्च न्यायालय का संगठन संविधान के अनुच्छेद 214 से 231 तक वर्णित है।
1. मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice)
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उच्च न्यायालय का प्रमुख अधिकारी होता है।
-
इनकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
-
राज्यपाल और भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श लिया जाता है।
2. अन्य न्यायाधीश (Other Judges)
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प्रत्येक उच्च न्यायालय में आवश्यकतानुसार अन्य न्यायाधीश होते हैं।
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संविधान में न्यायाधीशों की संख्या निश्चित नहीं की गई है — यह संख्या कार्यभार के अनुसार केंद्र सरकार द्वारा तय की जाती है।
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न्यायाधीशों की नियुक्ति भी राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
3. कोलेजियम प्रणाली (Collegium System)
-
मुख्य न्यायाधीश और अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों के परामर्श से नियुक्ति की जाती है।
-
इसमें सुप्रीम कोर्ट के CJI और अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल होते हैं।
4. पीठों का गठन (Benches)
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उच्च न्यायालय में विभिन्न प्रकार की पीठें (Benches) होती हैं:
-
एकल पीठ (Single Judge Bench)
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खंडपीठ (Division Bench) – दो न्यायाधीश
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पूर्ण पीठ (Full Bench) – तीन या अधिक न्यायाधीश
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5. रजिस्ट्रार और प्रशासनिक अधिकारी
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उच्च न्यायालय का प्रशासन रजिस्ट्रार जनरल, डिप्टी रजिस्ट्रार, सहायक रजिस्ट्रार आदि संभालते हैं।
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वे मामलों के रिकॉर्ड, सूची, नोटिस आदि का कार्य करते हैं।
6. अधिवक्ता मंडल (Bar)
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उच्च न्यायालय में अधिवक्ता मामलों की पैरवी करते हैं।
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इसमें वरिष्ठ अधिवक्ता, अधिवक्ता, अधिवक्ता लिपिक आदि शामिल होते हैं।
🔶 निष्कर्ष:
राज्य उच्च न्यायालय का संगठन ऐसा है कि वह न केवल राज्य में न्याय प्रदान करता है, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संविधान की मर्यादा, और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा भी करता है। यह न्यायिक प्रणाली का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ है।
Question उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति की विधि, योग्यता, कार्यकाल और हटाने की विधि लिखिए।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति की विधि, योग्यता, कार्यकाल और हटाने की विधि
🔷 1. नियुक्ति की विधि (Method of Appointment)
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 217 के अनुसार होती है।
(क) मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति:
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राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
-
इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श किया जाता है।
(ख) अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति:
-
राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
-
इसके लिए:
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भारत के मुख्य न्यायाधीश
-
संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश
-
संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श किया जाता है।
-
🔸 वर्तमान में कोलेजियम प्रणाली के माध्यम से नियुक्तियाँ होती हैं, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल होते हैं।
🔷 2. योग्यता (Qualifications)
अनुच्छेद 217(2) के अनुसार, उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ आवश्यक हैं:
-
भारत का नागरिक होना चाहिए।
-
निम्न में से कोई एक शर्त पूरी करनी चाहिए:
-
किसी उच्च न्यायालय में कम से कम 10 वर्षों तक अधिवक्ता रहा हो, या
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किसी न्यायिक पद पर कम से कम 10 वर्षों तक कार्य किया हो (भारत के किसी न्यायालय में, जो उच्च न्यायालय के अधीन न हो)।
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🔷 3. कार्यकाल (Tenure)
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उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति की आयु 62 वर्ष है।
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कार्यकाल के दौरान न्यायाधीश:
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चाहे तो स्वेच्छा से इस्तीफा दे सकता है (राष्ट्रपति को लिखित पत्र देकर),
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या संविधान के अनुसार हटाया जा सकता है।
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🔷 4. हटाने की विधि (Method of Removal / Impeachment)
🔹 अनुच्छेद 217(1)(b) और अनुच्छेद 124(4) के अनुसार:
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उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को केवल दुराचार (misbehaviour) या कार्य करने में अक्षमता (incapacity) के आधार पर हटाया जा सकता है।
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यह प्रक्रिया भी संसद के द्वारा तय की गई प्रक्रिया के अनुसार होती है।
🔹 हटाने की प्रक्रिया:
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संसद के किसी एक सदन में कम से कम 100 (लोकसभा) या 50 (राज्यसभा) सदस्य एक प्रस्ताव लाते हैं।
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प्रस्ताव पर विशेष बहुमत (special majority) से दोनों सदनों में मतदान होता है:
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उपस्थित और मतदान कर रहे सदस्यों का बहुमत,
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और कुल सदस्य संख्या का दो-तिहाई बहुमत।
-
-
इसके बाद राष्ट्रपति द्वारा न्यायाधीश को पद से हटाया जा सकता है।
⚠️ यह प्रक्रिया अत्यंत कठिन और दुर्लभ है। अब तक किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को इस प्रक्रिया से नहीं हटाया गया है।
✅ निष्कर्ष:
| विषय | विवरण |
|---|---|
| नियुक्ति | राष्ट्रपति द्वारा, CJI और राज्यपाल से परामर्श करके |
| योग्यता | 10 वर्ष अधिवक्ता या न्यायिक सेवा का अनुभव, भारत का नागरिक |
| कार्यकाल | 62 वर्ष की आयु तक |
| हटाने की विधि | संसद के विशेष बहुमत द्वारा, दुराचार या अक्षमता के आधार पर |
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और सेवा शर्तें इस प्रकार निर्धारित की गई हैं कि वे न्यायिक स्वतंत्रता और निष्पक्षता को बनाए रख सकें।
Question 5. उच्च न्यायालय की मुख्य शक्तियां/कार्य क्या हैं?
5. उच्च न्यायालय की मुख्य शक्तियाँ / कार्य
उच्च न्यायालय राज्य स्तर पर न्यायपालिका की सर्वोच्च संस्था होती है। यह संविधान के अनुच्छेद 214 से 231 तक वर्णित है। इसे संविधान द्वारा कई महत्वपूर्ण शक्तियाँ और कार्य सौंपे गए हैं ताकि यह न्यायिक व्यवस्था को सुचारु रूप से संचालित कर सके।
🔷 उच्च न्यायालय की मुख्य शक्तियाँ और कार्य:
1. मूल अधिकारों की रक्षा करना (Protection of Fundamental Rights)
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अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय को यह अधिकार है कि वह मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में रिट जारी कर सकता है।
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यह अधिकार अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को भी प्राप्त है, परंतु उच्च न्यायालय अन्य विधिक अधिकारों की रक्षा के लिए भी रिट जारी कर सकता है।
2. मूल अधिकारिता (Original Jurisdiction)
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कुछ मामलों में जैसे कि राजस्व विवाद, विवाह विवाद, भूमि सुधार आदि, उच्च न्यायालय में सीधे याचिका दाखिल की जा सकती है।
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इसके अंतर्गत यह कुछ मामलों की प्रारंभिक सुनवाई करता है।
3. अपीलीय अधिकारिता (Appellate Jurisdiction)
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उच्च न्यायालय, अधीनस्थ न्यायालयों के दीवानी (Civil) और फौजदारी (Criminal) मामलों में अपील सुनता है।
-
जिला एवं सत्र न्यायालयों, फैमिली कोर्ट आदि के निर्णयों के विरुद्ध अपील उच्च न्यायालय में की जा सकती है।
4. न्यायिक नियंत्रण (Supervisory Jurisdiction)
-
अनुच्छेद 227 के तहत उच्च न्यायालय को राज्य के अधीनस्थ न्यायालयों और अधिकरणों पर नियंत्रण एवं निरीक्षण करने का अधिकार है।
-
वह उनकी कार्यप्रणाली की निगरानी करता है और आवश्यक निर्देश दे सकता है।
5. प्रशासनिक शक्तियाँ (Administrative Powers)
-
अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति, स्थानांतरण, पदोन्नति और सेवा शर्तों पर निर्णय देने की शक्ति रखता है।
-
वह न्यायालयीन अधिकारियों और कर्मचारियों पर नियंत्रण रखता है।
6. अधीनस्थ न्यायालयों का निरीक्षण (Power of Inspection)
-
उच्च न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी निचले न्यायालयों का निरीक्षण कर सकता है।
-
यह सुनिश्चित करता है कि वे संविधान और कानून के अनुसार काम कर रहे हैं या नहीं।
7. लोकहित याचिका (Public Interest Litigation - PIL) स्वीकार करना
-
जब कोई व्यक्ति या संस्था सामाजिक या सार्वजनिक हित से जुड़े मामले में न्याय की मांग करता है, तब उच्च न्यायालय PIL स्वीकार कर सकता है।
8. व्याख्या की शक्ति (Power of Interpretation)
-
उच्च न्यायालय किसी भी राज्य कानून या नियम की संवैधानिक व्याख्या कर सकता है।
-
यह स्पष्ट करता है कि कानून संविधान के अनुरूप है या नहीं।
🔶 निष्कर्ष:
| शक्ति / कार्य | विवरण |
|---|---|
| रिट जारी करना | अनुच्छेद 226 के तहत मौलिक व अन्य विधिक अधिकारों की रक्षा |
| अपीलीय अधिकारिता | अधीनस्थ न्यायालयों के फैसलों पर पुनर्विचार |
| न्यायिक नियंत्रण | अधीनस्थ न्यायालयों पर निरीक्षण और नियंत्रण |
| प्रशासनिक कार्य | न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति, स्थानांतरण, निगरानी |
| लोकहित याचिका | समाज के हित में जनहित मामलों की सुनवाई |
इस प्रकार उच्च न्यायालय न्यायिक प्रणाली में एक मजबूत एवं स्वतंत्र स्तंभ के रूप में कार्य करता है जो कानून की रक्षा, संविधान की व्याख्या और नागरिकों को न्याय दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
Question 6. न्यायपालिका को स्वतंत्र बनाने के लिए की गई कोई छह व्यवस्थाएँ लिखिए।
6. न्यायपालिका को स्वतंत्र बनाने के लिए की गई छह प्रमुख व्यवस्थाएँ
भारतीय संविधान में न्यायपालिका को स्वतंत्र (Independent Judiciary) रखने के लिए कई महत्त्वपूर्ण व्यवस्थाएँ की गई हैं, ताकि न्यायपालिका राजनीतिक दबाव या बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त रहकर निष्पक्ष न्याय कर सके। नीचे ऐसी 6 प्रमुख व्यवस्थाएँ दी गई हैं:
🔷 1. न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका का सीमित हस्तक्षेप
-
उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति में कोलेजियम प्रणाली का उपयोग होता है।
-
इसमें कार्यपालिका (सरकार) की भूमिका सीमित और परामर्शात्मक होती है, जिससे राजनीतिक प्रभाव कम होता है।
🔷 2. कार्यकाल की सुरक्षा (Security of Tenure)
-
एक बार नियुक्त हो जाने पर न्यायाधीशों को निर्धारित आयु तक पद पर बने रहने का अधिकार है:
-
उच्चतम न्यायालय: 65 वर्ष
-
उच्च न्यायालय: 62 वर्ष
-
-
इन्हें कार्यकाल पूरा होने से पहले केवल संसद की विशेष प्रक्रिया (Impeachment) द्वारा ही हटाया जा सकता है।
🔷 3. वेतन और भत्तों की सुरक्षा (Fixed Salaries & Allowances)
-
न्यायाधीशों का वेतन, भत्ते और सेवा शर्तें संसद द्वारा तय किए जाते हैं।
-
इन्हें बिना संसद की अनुमति के कम नहीं किया जा सकता, जिससे न्यायपालिका पर वित्तीय दबाव नहीं बनता।
🔷 4. कार्यपालिका से अलग प्रशासनिक नियंत्रण
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न्यायपालिका का अपना प्रशासनिक तंत्र होता है, जिसमें कार्यपालिका का दखल नहीं होता।
-
उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालयों पर प्रशासनिक नियंत्रण रखता है।
🔷 5. न्यायिक कार्यों में हस्तक्षेप पर प्रतिबंध
-
संविधान के अनुसार, न्यायपालिका के निर्णयों में कार्यपालिका या विधायिका हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
-
न्यायिक प्रक्रिया पूरी तरह स्वतंत्र होती है।
🔷 6. रिट अधिकार (Power to Issue Writs)
-
उच्चतम न्यायालय (अनुच्छेद 32) और उच्च न्यायालय (अनुच्छेद 226) को रिट जारी करने का अधिकार है।
-
इससे वे सरकार या किसी भी संस्था के खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं, जिससे उनकी स्वायत्तता और संवैधानिक भूमिका मजबूत होती है।
✅ निष्कर्ष:
इन व्यवस्थाओं के माध्यम से भारतीय संविधान ने न्यायपालिका को एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और प्रभावी संस्था बनाया है, जो कानून का शासन (Rule of Law) बनाए रखने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने में सक्षम है।
Question 7. भारतीय न्यायिक प्रणाली की कोई छह कमियाँ लिखिए।
7. भारतीय न्यायिक प्रणाली की छह प्रमुख कमियाँ
भारतीय न्यायपालिका एक सशक्त एवं स्वतंत्र संस्था होते हुए भी कुछ गंभीर कमियों से ग्रसित है, जो न्याय प्राप्ति को धीमा, महंगा या जटिल बना देती हैं। नीचे भारतीय न्यायिक प्रणाली की 6 प्रमुख कमियाँ दी गई हैं:
🔴 1. मामलों का अत्यधिक बोझ (Case Backlog)
-
देश की अदालतों में लाखों मुकदमे लंबित हैं, जिनमें से कई वर्षों से विचाराधीन हैं।
-
इससे न्याय में देरी होती है और "Justice delayed is justice denied" की स्थिति उत्पन्न होती है।
🔴 2. न्यायाधीशों की कमी (Shortage of Judges)
-
भारत में जनसंख्या के अनुपात में न्यायाधीशों की संख्या बहुत कम है।
-
एक न्यायाधीश पर कई सौ या हजारों मामलों का बोझ होता है, जिससे निर्णय में देरी होती है।
🔴 3. मुकदमेबाजी की अधिकता (Excessive Litigation)
-
सरकार खुद सबसे बड़ी वादी (Litigant) है, जिससे अदालतों पर अनावश्यक भार बढ़ता है।
-
साथ ही, अनावश्यक और झूठे मुकदमे भी न्यायिक प्रक्रिया को धीमा करते हैं।
🔴 4. न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता (Complex Judicial Procedures)
-
कानूनी प्रक्रिया आम जनता के लिए जटिल और समझ से बाहर होती है।
-
आम नागरिक को वकील पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे न्याय प्राप्त करना कठिन और महंगा हो जाता है।
🔴 5. महंगे और खर्चीले मुकदमे (High Cost of Justice)
-
मुकदमों की प्रक्रिया लम्बी और खर्चीली होती है।
-
गरीब और पिछड़े वर्गों के लिए न्याय तक पहुंच पाना कठिन हो जाता है।
🔴 6. भ्रष्टाचार और पक्षपात के आरोप (Corruption and Bias Allegations)
-
कुछ मामलों में न्यायिक अधिकारियों पर भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद या राजनीतिक दबाव के आरोप लगे हैं।
-
इससे जनता का विश्वास कमजोर पड़ता है।
✅ निष्कर्ष:
| क्रम | कमी |
|---|---|
| 1. | लंबित मामलों की संख्या |
| 2. | न्यायाधीशों की कमी |
| 3. | मुकदमेबाजी की अधिकता |
| 4. | प्रक्रिया की जटिलता |
| 5. | न्याय की उच्च लागत |
| 6. | भ्रष्टाचार और निष्पक्षता पर प्रश्न |
इन कमियों को दूर करके ही भारतीय न्यायिक प्रणाली को तेज, सुलभ, पारदर्शी और न्यायपूर्ण बनाया जा सकता है।
