B.A 2 Year 3 Semester (Legislature)

 Legislature




Question 1. राज्य सभा की संरचना लिखिए।

1. राज्य सभा की संरचना

राज्य सभा भारत की संसद का वरिष्ठ सदन (Upper House) है, जिसे लोक सभा के विपरीत स्थायी सदन कहा जाता है क्योंकि इसे भंग नहीं किया जा सकता।


🔷 राज्य सभा की मुख्य संरचना:

विषय विवरण
कुल सदस्य संख्या अधिकतम 250 सदस्य (वर्तमान में 245 सदस्य)

नियुक्त सदस्य राष्ट्रपति द्वारा 12 सदस्यों को विशेषज्ञता या विशेष क्षेत्र के लिए नामित किया जाता है

चुनावित सदस्य राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों की विधान सभाओं के सदस्यों द्वारा निर्वाचित सदस्य (अधिकतम 238)

कार्यकाल सदन स्थायी होता है, पर प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है
एक तिहाई सदस्य हर 2 वर्ष में सेवानिवृत्त जिससे सदन का नवीनीकरण होता रहता है
अध्यक्ष राज्य सभा का अध्यक्ष होता है, जो राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त नहीं बल्कि सदस्यों में से चुना जाता है

विस्तार:

  1. चयनित सदस्य (Elected Members):

    • राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की विधान सभाओं के सदस्य प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष चुनाव के जरिए राज्य सभा में भेजे जाते हैं।

    • सदस्यों की संख्या राज्य की जनसंख्या के आधार पर तय होती है।

  2. नियुक्त सदस्य (Nominated Members):

    • राष्ट्रपति द्वारा नामांकित 12 सदस्य होते हैं।

    • ये साहित्य, विज्ञान, कला, समाज सेवा आदि क्षेत्रों के विशेषज्ञ होते हैं।


निष्कर्ष:

राज्य सभा भारत की संसद की एक स्थायी और प्रतिनिधि संस्था है, जिसमें राज्यों का प्रतिनिधित्व होता है और यह संघीय ढांचे को मजबूत बनाती है।



Question 2. राज्य सभा के कार्य/शक्तियाँ लिखिए।

2. राज्य सभा के कार्य/शक्तियाँ

राज्य सभा भारतीय संसद का एक स्थायी सदन है, जिसे संविधान ने कई महत्वपूर्ण कार्य और शक्तियाँ दी हैं। ये शक्तियाँ संसद की समग्र कार्यप्रणाली और भारत के लोकतंत्र के संचालन में अहम भूमिका निभाती हैं।


🔷 राज्य सभा के मुख्य कार्य और शक्तियाँ:


1. विधायी कार्य (Legislative Functions)

  • कानून बनाना: राज्य सभा लोक सभा के साथ मिलकर देश के लिए कानून बनाती है।

  • दोनों सदनों के समान अधिकार होते हैं, सिवाय कुछ विशेष मामलों के।

  • कानूनों पर चर्चा, संशोधन और पारित करना।


2. विशेष अधिकार (Special Powers)

  • राज्य सभा के पास कुछ विशेष शक्तियाँ हैं जो लोक सभा के पास नहीं होतीं:

    • अनुच्छेद 249 के तहत: यदि राज्य सभा दो-तिहाई बहुमत से कहे कि संसद को राज्य विषयों पर कानून बनाने की आवश्यकता है, तो संसद राज्य विषयों पर भी कानून बना सकती है।

    • अनुच्छेद 312 के तहत: राज्य सभा तीन-तिहाई बहुमत से राज्यों के लिए नए उच्च न्यायालय बनाने का प्रस्ताव कर सकती है।


3. अध्यक्ष और अन्य सदस्यों का चुनाव (Electoral Functions)

  • राज्य सभा के सदस्य राष्ट्रपति, लोक सभा और विधान सभा के सदस्यों के चुनाव में मतदान करते हैं।

  • यह महत्वपूर्ण चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा है।


4. प्रशासनिक और अनुशासनात्मक शक्तियाँ (Administrative and Disciplinary Powers)

  • राज्य सभा अपने सदस्यों के लिए नियम बनाती है।

  • वह सदस्यों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती है जैसे निलंबन या निष्कासन।


5. संसदीय समिति का गठन (Formation of Parliamentary Committees)

  • राज्य सभा संसदीय समितियाँ गठित कर सकती है, जो कानून निर्माण और सरकार की जांच में मदद करती हैं।


6. वित्तीय शक्तियाँ (Financial Powers)

  • राज्य सभा के पास वित्त विधेयकों (Money Bills) पर सीमित अधिकार होते हैं।

  • ये विधेयक केवल लोक सभा में प्रस्तुत होते हैं, लेकिन राज्य सभा को इसे पास या अस्वीकार करने का अधिकार 14 दिनों के भीतर होता है।

  • यदि राज्य सभा 14 दिनों के अंदर जवाब नहीं देती, तो इसे पास माना जाता है।


7. संसद का स्थायी सदस्य होना (Permanent House)

  • राज्य सभा को भंग नहीं किया जा सकता।

  • सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष होता है, और हर 2 वर्ष में एक तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं।


निष्कर्ष:

कार्य / शक्ति विवरण
विधायी कार्य            कानून बनाना और संशोधन करना

विशेष अधिकार        राज्य विषयों पर कानून बनाने की अनुमति देना, नए उच्च न्यायालय बनाना

चुनावी भूमिका
      राष्ट्रपति, लोकसभा, विधान सभा चुनावों में मतदान
अनुशासनात्मक कार्य         सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई करना

वित्तीय अधिकार       वित्त विधेयकों पर सलाह देना (सीमित अधिकार)

स्थायी सदन       सदन का भंग न होना और कार्यकाल की व्यवस्था

राज्य सभा भारत के संघीय ढांचे की मजबूती और न्यायपूर्ण विधायिका सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।



Question 3. लोक सभा (लोक सभा) की संरचना लिखिए।

3. लोक सभा की संरचना

लोक सभा भारत की संसद का निचला सदन (Lower House) है और इसे जनप्रतिनिधि सभा भी कहा जाता है। यह सीधे जनता द्वारा निर्वाचित सदस्यों से बनी होती है।


🔷 लोक सभा की मुख्य संरचना:

विषय विवरण
कुल सदस्य संख्या

        अधिकतम 552 सदस्य

चुनावित सदस्य       अधिकतम 530 सदस्य राज्यों के लिए, और अधिकतम 20 सदस्य केंद्रशासित प्रदेशों के लिए
नियुक्त सदस्य        राष्ट्रपति द्वारा विशेष समूहों (विशेष रूप से एंग्लो-भारतीय समुदाय) से अधिकतम 2 सदस्य           नियुक्त कर सकते थे (यह प्रावधान अब समाप्त हो चुका है)

कार्यकाल        सामान्यतः 5 वर्ष (यदि पहले भंग न किया जाए)

चुनाव प्रणाली         प्रत्यक्ष आम चुनाव (First Past The Post system)

अध्यक्ष (स्पीकर)         सदस्यों के द्वारा चुना जाता है, सदन का प्रमुख अधिकारी

विस्तार:

  1. चुनावित सदस्य (Elected Members):

    • भारत के राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से सीधे जनता के मतदान द्वारा चुने जाते हैं।

    • प्रत्येक सदस्य का निर्वाचन क्षेत्र (Constituency) निर्धारित होता है।

  2. नियुक्त सदस्य (Nominated Members):

    • पूर्व में राष्ट्रपति दो सदस्यों को एंग्लो-भारतीय समुदाय से नामित कर सकते थे, लेकिन यह प्रावधान अब समाप्त हो चुका है (104वां संविधान संशोधन के बाद)।

  3. स्थायी सदन नहीं:

    • लोक सभा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है, इसके बाद इसे भंग करके नए चुनाव कराए जाते हैं।

    • यदि आवश्यक हो तो इसे पहले भी भंग किया जा सकता है।


निष्कर्ष:

लोक सभा भारत की जनप्रतिनिधि और विधायी प्रक्रिया का मुख्य आधार है, जो देश की जनता का सीधा प्रतिनिधित्व करती है और सरकार के गठन में निर्णायक भूमिका निभाती है।




Question 4. भारतीय संसद की विधायी और कार्यकारी शक्तियों को

 लिखिए।

Answer

4. भारतीय संसद की विधायी और कार्यकारी शक्तियाँ


🔷 भारतीय संसद की विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers)

भारतीय संसद के पास देश के लिए कानून बनाने की सर्वोच्च विधायी शक्ति है। इसकी प्रमुख विधायी शक्तियाँ निम्नलिखित हैं:

  1. कानून बनाना (Making Laws):

    • संसद संघ के लिए सभी प्रकार के कानून बना सकती है।

    • इसमें नागरिक अधिकार, आर्थिक नीतियां, सामाजिक सुधार, कराधान, रक्षा आदि सभी विषय शामिल हैं।

  2. विधेयकों पर चर्चा और संशोधन:

    • संसद विधेयकों (Bills) पर बहस करती है, उन्हें संशोधित कर पारित करती है।

  3. वित्तीय विधेयक (Money Bill) को पारित करना:

    • वित्तीय विधेयक केवल लोक सभा में प्रस्तुत होते हैं।

    • राज्य सभा के पास इसे 14 दिनों के भीतर स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार है।

  4. राज्य विषयों पर कानून बनाने की विशेष अनुमति:

    • राज्य सभा के प्रस्ताव के बाद संसद राज्यों के विषयों पर भी कानून बना सकती है (अनुच्छेद 249 के तहत)।

  5. अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन करना:

    • संसद संविधान में आवश्यक संशोधन कर सकती है।


🔷 भारतीय संसद की कार्यकारी शक्तियाँ (Executive Powers)

हालांकि कार्यपालिका का संचालन प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिपरिषद द्वारा होता है, फिर भी संसद की भी कई कार्यकारी शक्तियाँ होती हैं:

  1. सरकार का गठन:

    • लोक सभा में बहुमत प्राप्त पार्टी या गठबंधन के नेता प्रधानमंत्री बनते हैं।

    • संसद के सामने ही सरकार ज़िम्मेदार होती है।

  2. मंत्रिपरिषद की निगरानी:

    • संसद सरकार के कामकाज पर नज़र रखती है।

    • मंत्रियों से प्रश्न पूछने, प्रश्नकाल, स्थायी समितियों के जरिए जांच करने का अधिकार।

  3. वित्तीय नियंत्रण:

    • संसद ही सरकार को धन आवंटित करती है।

    • सरकार के खर्चों और आय पर संसद की मंजूरी अनिवार्य है।

  4. विभिन्न पदों की नियुक्ति की पुष्टि:

    • राष्ट्रपति द्वारा कुछ प्रमुख पदों की नियुक्ति के लिए संसद की सहमति आवश्यक होती है।

  5. अविश्वास प्रस्ताव (No Confidence Motion):

    • लोक सभा सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला सकती है, जिसके पारित होने पर सरकार को इस्तीफा देना होता है।


निष्कर्ष:

शक्तियाँ विवरण
विधायी शक्तियाँ              कानून बनाना, संविधान संशोधन, वित्तीय विधेयक पारित करना,
                                 राज्य विषयों पर कानून बनाना

कार्यकारी शक्तियाँ               सरकार का गठन, मंत्रिपरिषद की निगरानी, वित्तीय नियंत्रण,
                                 अविश्वास प्रस्ताव, नियुक्तियों की पुष्टि

भारतीय संसद लोकतंत्र की रीढ़ है जो न केवल कानून बनाती है, बल्कि कार्यपालिका की गतिविधियों की भी निगरानी करती है और देश के सुचारु संचालन को सुनिश्चित करती है।




Question 5. लोकसभा और राज्यसभा के बीच आपसी संबंध लिखिए।

Answer

5. लोकसभा और राज्यसभा के बीच आपसी संबंध

भारतीय संसद दो सदनों—लोकसभा (निचला सदन) और राज्यसभा (वरिष्ठ सदन)—से मिलकर बनी है। दोनों सदनों के बीच मजबूत आपसी संबंध होते हैं, जो लोकतांत्रिक शासन के सुचारु संचालन के लिए आवश्यक हैं।


🔷 लोकसभा और राज्यसभा के बीच आपसी संबंध:

1. सहयोग और संतुलन का संबंध (Cooperation and Balance)

  • दोनों सदन मिलकर देश के लिए कानून बनाते हैं।

  • वे एक-दूसरे की राय को महत्व देते हैं, जिससे निर्णय संतुलित और न्यायपूर्ण होते हैं।

2. विधायी प्रक्रिया में पारस्परिक सहमति (Mutual Consent in Legislation)

  • अधिकांश कानून दोनों सदनों से पास होकर ही बनते हैं।

  • यदि किसी विधेयक पर मतभेद होता है, तो एक संसद समिति (Joint Committee) बनाकर विवाद सुलझाया जाता है।

3. वित्तीय विधेयक में प्राथमिकता लोक सभा को (Financial Bills and Lok Sabha’s Primacy)

  • वित्तीय विधेयक केवल लोक सभा में प्रस्तुत होते हैं।

  • राज्यसभा इसे 14 दिनों के भीतर स्वीकृत या अस्वीकार कर सकती है, लेकिन लोक सभा की मंशा सर्वोपरि होती है।

4. विशेष अधिकारों का वितरण (Division of Special Powers)

  • राज्यसभा को कुछ विशेष शक्तियाँ मिली हैं जैसे कि राज्य विषयों पर संसद को कानून बनाने की अनुमति देना।

  • लोक सभा सरकार का गठन करती है और सरकार इसके प्रति ज़िम्मेदार होती है।

5. अविश्वास प्रस्ताव और सरकार (No Confidence Motion)

  • केवल लोक सभा ही सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला सकती है।

  • राज्यसभा का सरकार पर कोई सीधे नियंत्रण नहीं होता।

6. संसदीय नियंत्रण (Parliamentary Oversight)

  • दोनों सदन मिलकर सरकार की कार्यप्रणाली पर निगरानी रखते हैं।

  • वे प्रश्नकाल, समितियाँ और अन्य संसदीय उपायों के जरिए सरकार को जवाबदेह बनाते हैं।


निष्कर्ष:

विषय विवरण
सहयोग और संतुलन            दोनों सदन मिलकर कानून बनाते हैं और संतुलन बनाए रखते हैं

विधायी प्रक्रिया             विधेयकों पर सहमति आवश्यक, मतभेदों पर संयुक्त समिति

वित्तीय विधेयक             लोक सभा की प्राथमिकता, राज्यसभा की सीमित भूमिका

विशेष अधिकार             राज्यसभा को कुछ विशेष शक्तियाँ प्राप्त हैं

अविश्वास प्रस्ताव              केवल लोक सभा के पास सरकार के खिलाफ प्रस्ताव लाने का अधिकार

संसदीय नियंत्रण               दोनों सदन सरकार की निगरानी करते हैं

इस प्रकार, लोकसभा और राज्यसभा के बीच सहयोग, संतुलन और विशिष्ट भूमिकाएं भारतीय संसदीय लोकतंत्र की मजबूती और प्रभावशीलता सुनिश्चित करती हैं।




Question भारत में लोकसभा, राज्यसभा से अधिक शक्तिशाली है।" टिप्पणी करें।

Answer

"भारत में लोकसभा, राज्यसभा से अधिक शक्तिशाली है" — टिप्पणी


भारतीय संसद दो सदनों—लोकसभा (निचला सदन) और राज्यसभा (वरिष्ठ सदन)—से मिलकर बनी है। दोनों सदनों का अपना महत्व और अधिकार है, लेकिन लोकसभा को अधिक शक्तिशाली माना जाता है। इसका कारण निम्नलिखित बिंदुओं से स्पष्ट होता है:


1. सरकार का गठन और जवाबदेही

  • भारत की सरकार लोक सभा की बहुमत पार्टी या गठबंधन के नेतृत्व में बनती है।

  • प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद सीधे लोक सभा के प्रति जिम्मेदार होते हैं।

  • यदि लोक सभा में सरकार का अविश्वास प्रस्ताव पास हो जाता है, तो सरकार को इस्तीफा देना पड़ता है।

  • राज्यसभा सरकार के प्रति सीधे जवाबदेह नहीं होती।


2. वित्तीय विधेयकों पर नियंत्रण

  • वित्तीय विधेयक केवल लोक सभा में प्रस्तुत किए जाते हैं।

  • राज्यसभा के पास वित्तीय विधेयकों को केवल 14 दिनों में स्वीकार या अस्वीकार करने का सीमित अधिकार है।

  • यदि राज्यसभा वित्तीय विधेयक को अस्वीकार कर भी दे, तो लोक सभा के निर्णय को अंतिम माना जाता है।


3. कार्यकाल और भंग होने की व्यवस्था

  • लोक सभा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है, लेकिन इसे आवश्यकता पड़ने पर भंग किया जा सकता है।

  • राज्यसभा एक स्थायी सदन है, जिसे भंग नहीं किया जा सकता।

  • लोक सभा के सदस्यों का चुनाव सीधे जनता द्वारा होता है, इसलिए लोक सभा जनता की इच्छा का अधिक प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करती है।


4. विधायी शक्ति में प्राथमिकता

  • अधिकांश विधेयक लोक सभा में शुरू होते हैं और यदि दोनों सदनों में मतभेद हों तो लोक सभा की इच्छा को अधिक महत्व दिया जाता है।

  • राज्यसभा के पास कुछ विशेष अधिकार होते हैं, लेकिन सामान्य कानून बनाने में लोक सभा का दबदबा होता है।


5. लोकसभा में जनप्रतिनिधित्व की श्रेष्ठता

  • लोक सभा के सदस्य जनता के सीधे प्रतिनिधि होते हैं।

  • राज्यसभा के सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से राज्यों की विधान सभाओं द्वारा चुने जाते हैं।

  • इसलिए लोक सभा को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अधिक वैधता और शक्ति प्राप्त होती है।


निष्कर्ष:

कारण विवरण
सरकार की जवाबदेही           सरकार केवल लोक सभा के प्रति जिम्मेदार होती है

वित्तीय नियंत्रण            वित्तीय विधेयकों पर लोक सभा की प्रमुखता

भंग की व्यवस्था            लोक सभा को भंग किया जा सकता है, राज्यसभा को नहीं

विधायी प्राथमिकता             कानून निर्माण में लोक सभा का दबदबा

जनप्रतिनिधित्व             लोक सभा के सदस्य सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं

इसलिए, भारतीय संविधान और संसदीय व्यवस्था में लोक सभा को राज्य सभा की तुलना में अधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली बनाया गया है। यह व्यवस्था लोकतंत्र की मूल भावना—जनता के प्रत्यक्ष शासन—को सुरक्षित रखने के लिए है।




Question 6. क्या भारतीय संसद संप्रभु है? भारतीय संसद की सीमाएँ लिखिए।

Answer

क्या भारतीय संसद संप्रभु है?

भारतीय संसद संप्रभु नहीं है। भारत एक संविधानात्मक लोकतंत्र है, जहाँ संसद की शक्तियाँ संविधान द्वारा सीमित और नियंत्रित हैं। इसका मतलब है कि संसद के पास अपनी इच्छानुसार कोई भी कानून बनाने या निर्णय लेने की पूर्ण स्वतंत्रता नहीं है। संसद को संविधान के नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करना होता है। संविधान ही संसद की सर्वोच्च सत्ता और अधिकार का स्रोत है, इसलिए संसद की संप्रभुता सीमित है।

इसका विरोधाभास यह है कि पारंपरिक रूप से, संप्रभु संसद का मतलब होता है कि संसद की कोई भी शक्ति या सीमा नहीं होती और वह किसी भी विषय पर कानून बना सकती है। लेकिन भारत में यह सिद्धांत लागू नहीं होता क्योंकि संसद के अधिकार संविधान द्वारा निर्धारित हैं, और सर्वोच्च न्यायालय के पास संसद के कानूनों की संवैधानिकता जांचने का अधिकार है।


भारतीय संसद की सीमाएँ (Detailed):

  1. संवैधानिक सीमाएँ (Constitutional Limitations):
    भारतीय संसद का कार्यक्षेत्र संविधान के अंतर्गत सीमित है। संसद को संविधान के अनुच्छेदों के अनुसार ही कानून बनाने का अधिकार है। यदि संसद कोई ऐसा कानून बनाती है जो संविधान के मूलभूत ढांचे (Basic Structure) के खिलाफ हो, तो वह असंवैधानिक माना जाएगा। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने "मिनरल वॉटर मुरलीधर" और "केशवानंद भारती" जैसे मामलों में स्पष्ट किया है कि संसद संविधान के मूलभूत ढांचे को बदल नहीं सकती।

  2. न्यायिक समीक्षा (Judicial Review):
    भारत में न्यायपालिका को यह अधिकार प्राप्त है कि वह संसद द्वारा बनाए गए कानूनों की संवैधानिकता की समीक्षा करे। यदि कोई कानून संविधान के खिलाफ होता है तो वह निरस्त भी किया जा सकता है। इसका मतलब है कि संसद की शक्ति न्यायपालिका के नियंत्रण में है। यह शक्ति संसद की संप्रभुता पर एक बड़ी सीमा लगाती है।

  3. फेडरल सीमाएँ (Federal Limitations):
    भारत एक संघीय राज्य है जहाँ केंद्र और राज्य सरकारों के अधिकार संविधान के तहत विभाजित हैं। संसद केवल उन विषयों पर कानून बना सकती है जो संविधान की अनुच्छेद सूची (Union List) में आते हैं। राज्य सूची (State List) में शामिल विषयों पर संसद की कोई शक्ति नहीं होती जब तक राज्य सरकारों की सहमति न हो या संविधान में कुछ विशेष प्रावधान न हों। इस प्रकार संसद के अधिकार संघीय ढांचे के अनुसार सीमित हैं।

  4. लोकतांत्रिक सीमाएँ (Democratic Limitations):
    संसद के सदस्य जनता द्वारा चुने जाते हैं, इसलिए संसद को जनता के हितों और अधिकारों का सम्मान करना पड़ता है। संसद को ऐसा कानून नहीं बनाना चाहिए जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करे। नागरिक अपनी सरकार के खिलाफ लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत विरोध भी कर सकते हैं।

  5. विधिक प्रक्रियात्मक सीमाएँ (Procedural Limitations):
    संसद कानून बनाने की प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है, जिसमें प्रस्ताव (Bill) पेश करना, चर्चा करना, मतदान करवाना आदि शामिल हैं। बिना उचित प्रक्रिया के कोई कानून पारित नहीं हो सकता।

  6. संविधान संशोधन की सीमाएँ (Limitations on Constitutional Amendments):
    संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि संसद संविधान के मूलभूत ढांचे को बदल नहीं सकती। इसका अर्थ है कि संसद के पास भी संविधान को पूरी तरह से बदलने की शक्ति नहीं है।


निष्कर्ष:

भारतीय संसद पूर्ण संप्रभु नहीं है। वह संविधान की सर्वोच्चता और न्यायिक समीक्षा के अधीन कार्य करती है। उसकी शक्तियाँ संविधान द्वारा सीमित हैं और वह लोकतांत्रिक, संघीय तथा विधिक सीमाओं का पालन करती है। इसलिए संसद की संप्रभुता सीमित और नियंत्रित है, न कि पूर्ण और असीमित।






Question 7. भारत में लोकसभा का अध्यक्ष कौन होता है? उसके छह कार्य लिखिए।

Answer

भारत में लोकसभा का अध्यक्ष स्पीकर (Speaker) होता है। स्पीकर लोकसभा का सर्वोच्च अधिकारी होता है और लोकसभा के सदस्यों द्वारा चुना जाता है। स्पीकर का मुख्य कर्तव्य लोकसभा की कार्यवाही को सुव्यवस्थित और अनुशासित तरीके से संचालित करना होता है। वह पूरी लोकसभा का प्रतिनिधि होता है और उसकी निष्पक्षता सदन के सुचारू संचालन के लिए अत्यंत आवश्यक होती है।

स्पीकर का चुनाव लोकसभा के पहले सत्र में होता है और वह अपने पद पर सदन के कार्यकाल तक बना रहता है, जब तक कि वह स्वयं पद त्याग न दे या सदन द्वारा हटाया न जाए। स्पीकर की भूमिका लोकतंत्र में बहुत महत्वपूर्ण होती है क्योंकि वह सदन के नियमों और अनुशासन को बनाए रखता है।


लोकसभा के अध्यक्ष (स्पीकर) के छह प्रमुख कार्य:

  1. सदन की कार्यवाही का संचालन (Presiding over the proceedings):
    स्पीकर लोकसभा की सभी बैठकों की अध्यक्षता करता है। वह चर्चा, बहस और सवाल-जवाब को नियंत्रित करता है ताकि सदन की कार्यवाही सुव्यवस्थित तरीके से हो। स्पीकर तय करता है कि किस सदस्य को कब बोलना है और चर्चा की सीमा क्या होगी।

  2. अनुशासन बनाए रखना (Maintaining discipline):
    स्पीकर सदन में अनुशासन बनाए रखने का कार्य करता है। यदि कोई सदस्य नियमों का उल्लंघन करता है, तो स्पीकर उसे चेतावनी देता है या सदन से बाहर भेज सकता है। इससे सदन की गरिमा और कार्यवाही का स्तर बना रहता है।

  3. संसदीय नियमों की व्याख्या (Interpreting rules of procedure):
    स्पीकर लोकसभा के नियमों और प्रथाओं की व्याख्या करता है। जब सदन में कोई विवाद होता है, तो स्पीकर का निर्णय अंतिम माना जाता है। वह संसद के संचालन में बाधा डालने वाली किसी भी समस्या का समाधान करता है।

  4. मतदान का संचालन (Conducting voting):
    जब लोकसभा में किसी मुद्दे पर मतदान होता है, तो स्पीकर मतदान का संचालन करता है और मतगणना की घोषणा करता है। वह सुनिश्चित करता है कि मतदान निष्पक्ष और सही तरीके से हो।

  5. संसदीय समितियों के अध्यक्ष का चुनाव और नियुक्ति (Appointment of committee chairpersons):
    स्पीकर लोकसभा की विभिन्न स्थायी और अस्थायी समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति या चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ये समितियाँ संसद के कामकाज को विस्तार से जांचती हैं।

  6. लोकसभा का प्रतिनिधित्व (Representing the Lok Sabha):
    स्पीकर संसद और सरकार के बीच एक सेतु का काम करता है। वह लोकसभा का प्रतिनिधित्व राष्ट्रपति और अन्य अधिकारियों के समक्ष करता है। स्पीकर संसद के बाहर भी लोकसभा का सम्मान बनाए रखने के लिए जिम्मेदार होता है।


निष्कर्ष:

स्पीकर लोकसभा के सुचारू और निष्पक्ष संचालन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण पद है। वह सदन की गरिमा बनाए रखने, अनुशासन लागू करने, नियमों की व्याख्या करने, और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सुनिश्चित करने में केंद्रीय भूमिका निभाता है। उसकी निष्पक्षता और समर्पण संसद के लोकतांत्रिक चरित्र को मजबूत करते हैं।



Question 8. भारतीय संसद में साधारण विधेयक पारित करने की विधि लिखिए।

Answer

8. भारतीय संसद में साधारण विधेयक पारित करने की विधि (Process of Passing an Ordinary Bill in the Indian Parliament)

भारतीय संसद में साधारण विधेयक (Ordinary Bill) किसी भी सामान्य विषय पर लाया जाने वाला विधेयक होता है, जो संविधान के किसी विशेष प्रावधान को संशोधित नहीं करता और न ही मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है। साधारण विधेयक संसद के दोनों सदनों — लोकसभा और राज्यसभा — में पारित किया जाता है।


साधारण विधेयक पारित करने की विस्तृत प्रक्रिया:

1. विधेयक का प्रस्तुतीकरण (Introduction of the Bill)

  • विधेयक संसद के किसी भी सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है। अगर यह विधेयक सरकार द्वारा लाया गया हो, तो इसे सरकारी विधेयक कहा जाता है। अन्यथा, इसे सदस्य विधेयक (Private Member's Bill) कहते हैं।

  • विधेयक को सदन में प्रथम पठन (First Reading) के लिए पेश किया जाता है। इस चरण में विधेयक की सामान्य संकल्पना प्रस्तुत की जाती है, लेकिन इस पर चर्चा नहीं होती।

2. प्रथम पठन (First Reading)

  • प्रथम पठन में केवल विधेयक का नाम और उद्देश्य सदन के समक्ष रखा जाता है। इसके बाद सदस्यों को विधेयक की प्रति उपलब्ध कराई जाती है।

  • इस चरण में विधेयक के खिलाफ या उसके समर्थन में कोई बहस नहीं होती।

3. विधेयक पर चर्चा (Second Reading)

  • यह विधेयक पारित करने की प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण चरण है।

  • इस चरण में विधेयक का विस्तृत अध्ययन किया जाता है। सदन विधेयक के प्रावधानों पर चर्चा करता है, संशोधन (Amendments) प्रस्तुत किए जा सकते हैं और वोटिंग होती है।

  • सामान्यतः इस चरण में विधेयक को दो भागों में चर्चा की जाती है:

    • प्रारंभिक चर्चा (General Discussion): जिसमें विधेयक के उद्देश्य और सिद्धांतों पर बहस होती है।

    • अनुच्छेदवार चर्चा (Clause-by-Clause Consideration): विधेयक के हर अनुच्छेद को पढ़ा और चर्चा किया जाता है। इसके बाद संशोधन स्वीकार या अस्वीकार किए जाते हैं।

  • यह कार्य सदन की सामान्य बैठक में या संसदीय समिति को भेजकर किया जा सकता है। संसदीय समिति विधेयक का गहन अध्ययन करती है और रिपोर्ट प्रस्तुत करती है।

4. तीसरा पठन (Third Reading)

  • तीसरे पठन में विधेयक का अंतिम रूप सदन के समक्ष रखा जाता है।

  • इस चरण में सदस्यों को विधेयक के पूरे प्रावधानों पर अंतिम चर्चा करने का अवसर मिलता है, लेकिन संशोधन की अनुमति नहीं होती।

  • इसके बाद विधेयक पर मतदान होता है। यदि विधेयक सदन में बहुमत से पारित हो जाता है, तो वह अगले सदन में भेजा जाता है।

5. दूसरे सदन में विधेयक की प्रक्रिया (Consideration by the Other House)

  • विधेयक पारित होने के बाद दूसरे सदन (अगर विधेयक लोकसभा में आया है तो राज्यसभा में और यदि राज्यसभा में आया है तो लोकसभा में) भेजा जाता है।

  • दूसरे सदन में विधेयक की वही प्रक्रिया दोहराई जाती है — प्रथम पठन, दूसरा पठन (चर्चा, संशोधन), तीसरा पठन और मतदान।

  • दूसरे सदन द्वारा भी विधेयक को बहुमत से पारित करना आवश्यक है।

6. विधान में मतभेद होने पर (If There Are Differences Between the Two Houses)

  • यदि दोनों सदनों के बीच विधेयक के प्रावधानों में मतभेद हो, तो संसद के दोनों सदनों के सदस्यों से एक मिलीजुली समिति (Joint Committee) बनाई जा सकती है, जो मतभेदों को सुलझाए।

  • समिति की रिपोर्ट दोनों सदनों में प्रस्तुत की जाती है और उस पर मतदान होता है।

  • यदि मतभेद सुलझाए नहीं जाते, तो विधेयक पास नहीं हो पाता।

7. राष्ट्रपति की स्वीकृति (Assent of the President)

  • दोनों सदनों द्वारा विधेयक पारित होने के बाद वह राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है।

  • राष्ट्रपति तीन विकल्पों में से कोई एक चुन सकते हैं:

    • विधेयक को स्वीकृति (Assent) देना, जिससे वह कानून बन जाता है।

    • विधेयक को पुनः विचार के लिए संसद को वापस भेजना (Except Money Bill)।

    • यदि पुनः पारित होने के बाद भी राष्ट्रपति असहमति जताते हैं, तो वह अंततः विधेयक को अस्वीकार कर सकते हैं। यह अत्यंत दुर्लभ होता है।

  • राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद विधेयक कानून बन जाता है और लागू होता है।


सारांश में साधारण विधेयक पारित करने की प्रक्रिया:

चरण क्रिया
1. विधेयक का संसद में प्रस्तावन (Introduction)
2. प्रथम पठन (First Reading) — विधेयक का नाम और उद्देश्य प्रस्तुत करना
3. द्वितीय पठन (Second Reading) — चर्चा, संशोधन और मतदान
4. तृतीय पठन (Third Reading) — अंतिम चर्चा और मतदान
5. दूसरे सदन में उसी प्रक्रिया को दोहराना
6. मतभेद होने पर मिलीजुली समिति का गठन और रिपोर्ट
7. राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त करना

नोट:

  • साधारण विधेयक वह होता है जो संविधान में विशेष अधिकारों या मौलिक अधिकारों को प्रभावित नहीं करता।

  • इसके विपरीत, विशेष विधेयक जैसे संविधान संशोधन विधेयक, विधेयक पारित करने की अलग और कठिन प्रक्रिया होती है।

  • मनी बिल की प्रक्रिया भी अलग होती है, जिसमें राज्यसभा की सीमित भूमिका होती है।






Question 9. धन विधेयक क्या है? धन विधेयक पारित करने की प्रक्रिया लिखिए।

Answer

9. धन विधेयक क्या है? धन विधेयक पारित करने की प्रक्रिया (What is a Money Bill? Detailed Process of Passing a Money Bill)


धन विधेयक क्या है?

धन विधेयक (Money Bill) वह विधेयक होता है जो केवल वित्तीय मामलों से संबंधित होता है, जैसे:

  • सरकार के राजस्व (टैक्स, कस्टम ड्यूटी आदि) से संबंधित प्रावधान,

  • सरकार द्वारा धन की प्राप्ति या व्यय से संबंधित प्रावधान,

  • किसी वित्तीय लेन-देन की मंजूरी,

  • सरकार के ऋण से संबंधित प्रावधान,

  • पूंजीगत व्यय और बजट से जुड़े अन्य वित्तीय विषय।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 110 में धन विधेयक की परिभाषा दी गई है। इसमें यह स्पष्ट है कि धन विधेयक केवल उन्हीं विषयों से संबंधित हो सकता है जो वित्तीय लेन-देन या खर्च से जुड़े हों।


धन विधेयक की विशेषताएँ:

  • धन विधेयक केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है। राज्यसभा में धन विधेयक को प्रस्तुत या संशोधित नहीं किया जा सकता।

  • धन विधेयक के पास होने पर ही सरकार बजट आदि के लिए धन का प्रावधान कर सकती है।

  • धन विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति के बिना कानून नहीं माना जा सकता।


धन विधेयक पारित करने की प्रक्रिया (Process of Passing a Money Bill):

1. विधेयक का प्रस्तुतीकरण (Introduction in Lok Sabha):

धन विधेयक केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है। यह विधेयक सरकार द्वारा लाया जाता है, और इसे सदन के किसी सदस्य द्वारा पेश नहीं किया जा सकता।

2. लोकसभा में प्रथम पठन (First Reading in Lok Sabha):

  • विधेयक का नाम और उद्देश्य सदन में पढ़ा जाता है।

  • इस चरण में विधेयक पर कोई बहस नहीं होती।

3. लोकसभा में चर्चा और मतदान (Discussion and Voting in Lok Sabha):

  • लोकसभा में धन विधेयक पर सदस्यों द्वारा चर्चा की जाती है।

  • यदि आवश्यक हो तो संशोधन भी प्रस्तावित किए जा सकते हैं।

  • अंत में विधेयक पर मतदान होता है। यदि बहुमत से विधेयक पारित हो जाता है तो वह राज्यसभा को भेजा जाता है।

4. राज्यसभा में विचार (Consideration by Rajya Sabha):

  • राज्यसभा धन विधेयक को केवल स्वीकृति देने, अस्वीकृति देने, या संशोधन का सुझाव देने के लिए विचार कर सकती है।

  • राज्यसभा के पास धन विधेयक को खारिज करने या संशोधन करने का कोई अधिकार नहीं है।

  • यदि राज्यसभा संशोधन का सुझाव देती है, तो लोकसभा उस संशोधन को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है।

  • राज्यसभा को धन विधेयक पर अपनी राय 14 दिनों के भीतर देनी होती है, अन्यथा इसे स्वचालित रूप से स्वीकृत माना जाता है।

5. लोकसभा द्वारा संशोधनों पर अंतिम निर्णय (Final Decision by Lok Sabha):

  • यदि राज्यसभा ने संशोधन सुझाए हैं, तो लोकसभा उस पर विचार करती है। लोकसभा के निर्णय के बिना संशोधन लागू नहीं होते।

6. राष्ट्रपति की स्वीकृति (Assent of the President):

  • लोकसभा द्वारा पारित धन विधेयक राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है।

  • राष्ट्रपति को धन विधेयक पर स्वीकृति देनी ही होती है, वह उसे अस्वीकार नहीं कर सकते।

  • स्वीकृति मिलने के बाद धन विधेयक कानून बन जाता है और लागू होता है।


धन विधेयक पारित करने की प्रक्रिया का सारांश:

चरण प्रक्रिया
1 धन विधेयक केवल लोकसभा में प्रस्तुत होता है।
2 लोकसभा में प्रथम पठन।
3 लोकसभा में चर्चा, संशोधन (यदि कोई हो) और मतदान।
4 राज्यसभा में विचार, संशोधन का सुझाव दे सकती है, लेकिन पारित या खारिज नहीं कर सकती।
5 लोकसभा संशोधनों को स्वीकार या अस्वीकार करती है।
6 राष्ट्रपति की स्वीकृति, जिसके बाद विधेयक कानून बन जाता है।

अन्य महत्वपूर्ण बिंदु:

  • धन विधेयक संसद का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण विधेयक होता है क्योंकि यह सरकार के वित्तीय प्रबंधन को प्रभावित करता है।

  • राज्यसभा की सीमित भूमिका लोकतंत्र में वित्तीय प्रभुत्व को सुनिश्चित करती है क्योंकि लोकसभा सीधे जनता द्वारा चुनी जाती है।

  • धन विधेयक के बिना सरकार को अपने कार्यों के लिए धन जुटाना संभव नहीं होता।





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