B.A 2 Year 3rd Semester Political Science Unit-1 Important Questions
Question (1) सर्वोच्च न्यायालय/उच्च न्यायालय के संगठन और कार्यों का वर्णन कीजिए।
Answer :-
सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) और उच्च न्यायालय (High Court) भारत की न्यायिक व्यवस्था के दो महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। इनका गठन भारतीय संविधान के तहत हुआ है, और ये न्याय दिलाने के साथ-साथ संविधान की रक्षा करने का भी कार्य करते हैं। आइए इनके संगठन और कार्यों का क्रमबद्ध वर्णन करते हैं:
1. सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court)
(क) संगठन:
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स्थापना: 28 जनवरी 1950 को।
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स्थान: नई दिल्ली में स्थित है।
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संविधानिक आधार: अनुच्छेद 124 से 147 तक।
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संरचना:
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एक मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) और अधिकतम 33 अन्य न्यायाधीश।
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न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
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सेवानिवृत्ति की आयु: 65 वर्ष।
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(ख) कार्य:
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मूल अधिकारों की रक्षा:
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यदि किसी नागरिक के मूल अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो वह सीधे सर्वोच्च न्यायालय में जा सकता है (अनुच्छेद 32)।
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मूल अधिकार क्षेत्र (Original Jurisdiction):
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संघ और राज्यों या दो राज्यों के बीच विवादों की सुनवाई करता है।
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अपील क्षेत्राधिकार (Appellate Jurisdiction):
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उच्च न्यायालयों से आए फैसलों की अपील की जाती है।
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सलाहकार कार्य (Advisory Jurisdiction):
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राष्ट्रपति किसी कानूनी प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय से राय ले सकता है (अनुच्छेद 143)।
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संवैधानिक व्याख्या:
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संविधान की व्याख्या करने का अंतिम अधिकार।
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विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition - SLP):
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अनुच्छेद 136 के तहत किसी भी न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध विशेष अनुमति मांगी जा सकती है।
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2. उच्च न्यायालय (High Court)
(क) संगठन:
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संविधानिक आधार: अनुच्छेद 214 से 231 तक।
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प्रत्येक राज्य या राज्यों के समूह के लिए एक उच्च न्यायालय हो सकता है।
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संरचना:
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एक मुख्य न्यायाधीश और आवश्यक संख्या में अन्य न्यायाधीश।
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नियुक्ति: राष्ट्रपति द्वारा, राज्यपाल की सलाह से।
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सेवानिवृत्ति की आयु: 62 वर्ष।
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(ख) कार्य:
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मूल अधिकार क्षेत्र:
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अनुच्छेद 226 के तहत नागरिक अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए याचिका दायर कर सकते हैं।
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अपील और पुनरीक्षण कार्य:
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अधीनस्थ न्यायालयों के फैसलों की समीक्षा करता है।
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प्रशासनिक नियंत्रण:
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अपने क्षेत्र के अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण।
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विधिक सलाहकार कार्य:
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राज्य सरकार को कानूनी सलाह देना।
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लोकहित याचिका (PIL) की सुनवाई:
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सार्वजनिक हित से जुड़े मुद्दों पर स्वतः संज्ञान ले सकता है।
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निष्कर्ष:
सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों भारतीय लोकतंत्र के आधार स्तंभ हैं। ये केवल न्याय प्रदान करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखने, मूल अधिकारों की रक्षा करने, और विधायिका तथा कार्यपालिका पर नियंत्रण बनाए रखने की भूमिका भी निभाते हैं।
Question (2) राष्ट्रपति के चुनाव और शक्तियों की व्याख्या कीजिए।
Answer :-
भारतीय संविधान के अनुसार राष्ट्रपति भारत का राष्ट्र प्रमुख (Head of the State) होता है। यद्यपि भारत एक गणराज्य (Republic) है और कार्यपालिका की असली शक्ति प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद के पास होती है, फिर भी राष्ट्रपति की भूमिका महत्वपूर्ण और गरिमामय होती है।
🔷 1. राष्ट्रपति का चुनाव (Election of the President)
📌 संविधानिक प्रावधान:
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अनुच्छेद 52 से 62 तक।
📌 चुनाव की प्रक्रिया:
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परोक्ष चुनाव (Indirect Election):
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राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता द्वारा नहीं, बल्कि एक निर्वाचक मंडल (Electoral College) द्वारा होता है।
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निर्वाचक मंडल में शामिल होते हैं:
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भारत के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के निर्वाचित सदस्य।
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राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों (दिल्ली व पुदुचेरी) की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य।
⚠ विधान परिषद (Legislative Council) के सदस्य भाग नहीं लेते।
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मतदान की पद्धति:
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आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (Proportional Representation) द्वारा एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) के आधार पर।
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यह प्रक्रिया गोपनीय मतदान के माध्यम से होती है।
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योग्यता:
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भारतीय नागरिक हो।
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न्यूनतम आयु 35 वर्ष।
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लोकसभा का सदस्य चुने जाने के योग्य हो।
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लाभ के किसी पद पर न हो (जैसे सरकारी नौकरी)।
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कार्यकाल:
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5 वर्ष (लेकिन पुनः चुनाव में भाग लेने की अनुमति है)।
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🔷 2. राष्ट्रपति की शक्तियाँ (Powers of the President)
राष्ट्रपति के पास कई प्रकार की शक्तियाँ होती हैं:
✅ (क) कार्यपालिका शक्तियाँ (Executive Powers):
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प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की नियुक्ति।
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राज्यपालों की नियुक्ति।
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भारत के उच्च पदों पर नियुक्ति: जैसे सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, चुनाव आयुक्त, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG), UPSC के सदस्य आदि।
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प्रशासनिक कार्य: सभी कार्य राष्ट्रपति के नाम पर किए जाते हैं।
✅ (ख) विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers):
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संसद सत्र बुलाना, स्थगित करना और भंग करना।
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संसद के विधेयकों को स्वीकृति देना।
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विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस भेजना (सिर्फ एक बार)।
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अध्यादेश जारी करना (Ordinance) जब संसद सत्र में न हो (अनुच्छेद 123)।
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राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाना (अनुच्छेद 356)।
✅ (ग) न्यायिक शक्तियाँ (Judicial Powers):
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दया याचिकाओं पर निर्णय: मृत्युदंड या अन्य सजा को क्षमा, निलंबन, या परिवर्तन कर सकते हैं (अनुच्छेद 72)।
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न्यायाधीशों की नियुक्ति और उनके पदत्याग या हटाने से संबंधित शक्तियाँ।
✅ (घ) आपातकालीन शक्तियाँ (Emergency Powers):
राष्ट्रपति को तीन प्रकार की आपात स्थितियों में विशेष शक्तियाँ मिलती हैं:
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राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) — युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह।
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राज्य आपातकाल (अनुच्छेद 356) — संविधानीय तंत्र विफल होने पर।
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वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360) — वित्तीय स्थिरता को खतरा होने पर।
✅ (ङ) सैन्य शक्तियाँ (Military Powers):
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राष्ट्रपति भारतीय सशस्त्र बलों का सर्वोच्च सेनापति होता है।
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लेकिन युद्ध की घोषणा या शांति समझौता केवल संसद की स्वीकृति से ही किया जा सकता है।
🔷 3. निष्कर्ष (Conclusion):
राष्ट्रपति भारत का संवैधानिक प्रमुख होता है। उसकी भूमिका मुख्यतः प्रतीकात्मक (Ceremonial) है, क्योंकि वह प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करता है। फिर भी आपात स्थितियों, दया याचिका, अध्यादेश जारी करना आदि क्षेत्रों में उसकी भूमिका निर्णायक हो सकती है।
राष्ट्रपति भारतीय लोकतंत्र की एकता, अखंडता और संविधान की मर्यादा का प्रतीक होता है।
Question (3) प्रधानमंत्री के चुनाव और शक्तियों की व्याख्या कीजिए।
Answer :-
भारतीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री देश की कार्यपालिका का वास्तविक प्रधान होता है। संविधान के अनुसार राष्ट्रपति देश का संवैधानिक प्रमुख है, लेकिन वास्तविक शक्तियाँ प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद के हाथ में होती हैं।
🔷 1. प्रधानमंत्री का चुनाव (Election of the Prime Minister)
📌 संविधानिक प्रावधान:
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प्रधानमंत्री की नियुक्ति का प्रावधान अनुच्छेद 75(1) में है।
📌 चुनाव की प्रक्रिया:
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लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल/गठबंधन का नेता प्रधानमंत्री बनता है।
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राष्ट्रपति उस व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है जिसे वह लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल/गठबंधन का नेता मानता है।
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प्रधानमंत्री लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य होना चाहिए।
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यदि नहीं है, तो उसे 6 माह के भीतर संसद का सदस्य बनना अनिवार्य होता है।
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📌 कार्यकाल:
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कोई निश्चित कार्यकाल नहीं है, लेकिन यह लोकसभा के कार्यकाल (5 वर्ष) और प्रधानमंत्री के बहुमत पर निर्भर करता है।
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जब तक प्रधानमंत्री संसद में बहुमत बनाए रखता है, तब तक वह पद पर बना रह सकता है।
🔷 2. प्रधानमंत्री की शक्तियाँ (Powers of the Prime Minister)
प्रधानमंत्री को कई क्षेत्रों में शक्तियाँ प्राप्त हैं, जिन्हें निम्नलिखित रूप से विभाजित किया जा सकता है:
✅ (क) कार्यपालिका शक्तियाँ (Executive Powers):
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प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद का नेतृत्व करता है।
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मंत्रियों की नियुक्ति, पुनर्गठन, और त्यागपत्र स्वीकृति का कार्य करता है।
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विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के कार्यों का समन्वय करता है।
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राष्ट्रपति को सलाह देने का कार्य करता है (जो कि बाध्यकारी होती है)।
✅ (ख) विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers):
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संसद के कार्यक्रम और कार्यसूची निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका।
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संसद में नीतियों और योजनाओं की घोषणा।
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विश्वास मत या अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना।
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राष्ट्रपति को संसद भंग करने की सिफारिश करना।
✅ (ग) नीतिगत शक्तियाँ (Policy-making Powers):
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देश की आंतरिक और बाह्य नीतियों का निर्धारण करता है।
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राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक, सामाजिक, विदेश नीति आदि में अंतिम निर्णय की भूमिका निभाता है।
✅ (घ) प्रशासनिक शक्तियाँ (Administrative Powers):
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विभिन्न मंत्रालयों के कार्यों का निर्देशन और नियंत्रण करता है।
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शीर्ष अधिकारियों की नियुक्तियों में निर्णायक भूमिका (जैसे कैबिनेट सचिव, मुख्य सचिव, आदि)।
✅ (ङ) अंतरराष्ट्रीय शक्तियाँ (Foreign Powers):
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अन्य देशों के साथ सम्बंध स्थापित करना, समझौते करना, दौरे पर जाना।
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विदेश नीति को मंत्रिपरिषद की सलाह से लागू करना।
✅ (च) संकट के समय भूमिका:
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युद्ध, आपातकाल, प्राकृतिक आपदा आदि के समय प्रधानमंत्री की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण होती है।
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रक्षा और सुरक्षा संबंधी निर्णयों में अग्रणी भूमिका निभाता है।
🔷 3. प्रधानमंत्री की स्थिति (Position of the Prime Minister)
"प्रधानमंत्री कैबिनेट का प्रमुख, राष्ट्र की नीतियों का मार्गदर्शक, और लोकसभा में सरकार का नेता होता है।"
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संविधान विशेषज्ञ बी. आर. अम्बेडकर ने कहा था:
"प्रधानमंत्री सूर्य के समान है, बाकी मंत्री उसके ग्रह हैं जो उससे प्रकाश लेते हैं।"
🔷 4. निष्कर्ष (Conclusion):
प्रधानमंत्री भारत सरकार का वास्तविक मुखिया होता है। वह मंत्रिपरिषद के कार्यों का संचालन करता है, नीतियाँ तय करता है और संसद व जनता के प्रति उत्तरदायी होता है। उसकी भूमिका केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक, संवैधानिक और कूटनीतिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
Question (4) "यद्यपि भारत का संविधान सरकार के तीनों अंगों के लिए सुपरिभाषित कार्यों का प्रावधान करता है, फिर भी यह शक्तियों के कठोर पृथक्करण की वकालत नहीं करता है।" चर्चा कीजिए।
Answer :-
यह कथन भारत के संविधान की संविधानिक संरचना और व्यवहारिक लचीलेपन की सूक्ष्म समझ को दर्शाता है। इसमें दो प्रमुख पहलू हैं:
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भारत का संविधान तीनों अंगों – विधायिका (Legislature), कार्यपालिका (Executive), और न्यायपालिका (Judiciary) – के लिए सुपरिभाषित कार्यों का प्रावधान करता है।
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लेकिन यह शक्तियों के कठोर पृथक्करण (strict separation of powers) का समर्थन नहीं करता।
इस कथन की गहराई से विवेचना करने के लिए हमें पहले शक्तियों के पृथक्करण सिद्धांत को समझना होगा, फिर भारतीय संविधान में इसके व्यावहारिक रूप को।
🔶 1. शक्तियों का पृथक्करण सिद्धांत (Separation of Powers Theory):
इस सिद्धांत को फ्रांसीसी चिंतक मॉन्टेस्क्यू (Montesquieu) ने अपनी कृति ‘The Spirit of Laws’ में प्रतिपादित किया था।
इस सिद्धांत के अनुसार:
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सरकार की तीनों शाखाएँ – विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका – स्वतंत्र और अलग होनी चाहिए।
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किसी भी शाखा को दूसरी शाखा के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
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इससे शक्ति के दुरुपयोग से बचा जा सकता है और लोकतंत्र को सुरक्षित किया जा सकता है।
👉 यह सिद्धांत अमेरिका जैसे देशों में सख्ती से लागू होता है, जहाँ राष्ट्रपति, संसद और न्यायपालिका एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं।
🔶 2. भारतीय संविधान में शक्तियों का विभाजन:
भारतीय संविधान शक्तियों के पृथक्करण की अवधारणा को आंशिक रूप में स्वीकार करता है, लेकिन इसे कठोर रूप में लागू नहीं करता। यह अधिक लचीली और समन्वयपूर्ण व्यवस्था पर बल देता है।
संविधान में तीनों अंगों के कार्य इस प्रकार विभाजित हैं:
| अंग | प्रमुख कार्य | संबंधित अनुच्छेद |
|---|---|---|
| विधायिका | कानून बनाना | अनुच्छेद 79–122 |
| कार्यपालिका | नीतियों को लागू करना | अनुच्छेद 52–78, 153–167 |
| न्यायपालिका | कानून की व्याख्या व न्याय करना | अनुच्छेद 124–147, 214–231 |
परंतु, व्यवहार में इन अंगों के बीच कुछ ओवरलैपिंग (overlapping) और संवैधानिक नियंत्रण देखने को मिलते हैं।
🔶 3. भारत में शक्तियों का कठोर पृथक्करण क्यों नहीं है?
➤ (क) संसदीय प्रणाली की प्रकृति:
भारत ने ब्रिटिश प्रणाली (Westminster Model) को अपनाया है, जिसमें कार्यपालिका विधायिका से ही निकलती है। प्रधानमंत्री और मंत्रीगण लोकसभा या राज्यसभा के सदस्य होते हैं, जिससे दोनों अंगों में पारस्परिक संबंध होते हैं।
➤ (ख) व्यावहारिक आवश्यकताएँ:
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में सरकार के अंगों का पूर्ण पृथक्करण अव्यवहारिक होता। निर्णय-निर्माण और नीति क्रियान्वयन में सहयोग आवश्यक होता है।
➤ (ग) नियंत्रण और संतुलन (Checks and Balances):
भारतीय संविधान का उद्देश्य शक्ति का संतुलन बनाना है, न कि पूर्ण पृथक्करण। सभी अंग एक-दूसरे की शक्तियों को नियंत्रित और संतुलित करते हैं।
🔶 4. अंगों के बीच शक्तियों का ओवरलैप (Overlap of Powers):
✅ (1) विधायिका और कार्यपालिका:
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प्रधानमंत्री और मंत्री विधायिका के सदस्य होते हैं।
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कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है (जैसे: विश्वास मत)।
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कई बार कार्यपालिका द्वारा अध्यादेश (ordinance) लाकर कानून बनाया जाता है।
✅ (2) कार्यपालिका और न्यायपालिका:
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राष्ट्रपति न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है (हालाँकि कोलेजियम प्रणाली के माध्यम से)।
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न्यायपालिका, कार्यपालिका के कार्यों की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) कर सकती है।
✅ (3) विधायिका और न्यायपालिका:
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संसद संविधान संशोधन कर सकती है, लेकिन न्यायपालिका उसे असंवैधानिक ठहरा सकती है यदि वह संविधान के मूल ढाँचे के विरुद्ध हो।
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संसद न्यायपालिका की आलोचना कर सकती है, लेकिन न्यायिक स्वतंत्रता की मर्यादा बनी रहती है।
🔶 5. न्यायिक दृष्टिकोण (Judicial Interpretation):
🏛 (i) केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973):
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान का मूल ढाँचा (Basic Structure) अटल है और इसमें शक्तियों का संतुलन भी शामिल है।
🏛 (ii) मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980):
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न्यायालय ने कहा कि तीनों अंगों के बीच संतुलन बनाए रखना संविधान की आत्मा है।
🔶 6. निष्कर्ष (Conclusion):
भारत का संविधान तीनों अंगों के लिए सुपरिभाषित कार्य निर्धारित करता है, लेकिन यह कठोर पृथक्करण का सैद्धांतिक अनुकरण नहीं करता। इसके स्थान पर, यह कार्यात्मक लचीलापन, संवैधानिक संतुलन, और आपसी नियंत्रण की व्यवस्था करता है।
👉 इस व्यवस्था के कारण:
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सरकार अधिक व्यवहारिक, उत्तरदायी, और समन्वित बनती है।
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लोकतंत्र को संरक्षित रखते हुए शासन प्रणाली को सुचारू रूप से चलाया जा सकता है।
✍️ अतः, यह कथन पूर्णतः सत्य है कि "भारत का संविधान सरकार के तीनों अंगों के लिए सुपरिभाषित कार्यों का प्रावधान करता है, फिर भी यह शक्तियों के कठोर पृथक्करण की वकालत नहीं करता है।" यह संविधान की व्यावहारिकता और विवेकशीलता को दर्शाता है।
