तुर्क–अफ़गान शासन के दौरान पंजाब की सामाजिक स्थिति
प्रस्तावना
पंजाब की भूमि सदियों से सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र रही है। 11वीं से 16वीं शताब्दी तक पंजाब पर तुर्क–अफ़गान शासकों का प्रभाव गहराई से देखा गया। महमूद गजनवी के आक्रमणों से लेकर लोधियों और सूरों तक, पंजाब एक महत्वपूर्ण सैन्य, प्रशासनिक और सांस्कृतिक केंद्र बना रहा। इस अवधि में पंजाब की सामाजिक संरचना में उल्लेखनीय परिवर्तन आए—कुछ सकारात्मक, कुछ नकारात्मक। तुर्क–अफ़गान शासन ने जहां नई सामाजिक प्रथाओं, धार्मिक मान्यताओं और जीवनशैली के तत्व प्रदान किए, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक अस्थिरता, युद्ध और आर्थिक उतार–चढ़ाव ने समाज को भी प्रभावित किया।
यह निबंध तुर्क–अफ़गान शासन के दौरान पंजाब के सामाजिक जीवन, धर्म, जाति व्यवस्था, आर्थिक गतिविधियों, कला–संस्कृति तथा लोक-जीवन के सभी पहलुओं का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
1. पंजाब में तुर्क–अफ़गान शासन का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
1.1 प्रारंभिक आक्रमण
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1001 ई. में महमूद गजनवी के आक्रमण से तुर्क शासन की शुरुआत मानी जाती है।
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12वीं शताब्दी में मुहम्मद गौरी के आक्रमणों के बाद पंजाब पूर्ण रूप से मुस्लिम तुर्क शासन का भाग बन गया।
1.2 दिल्ली सल्तनत का उदय
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पंजाब दिल्ली सल्तनत का महत्वपूर्ण सूबा बना।
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तुर्क, खिलजी, तुगलक, सैयद और लोधी वंशों की नीतियों का सीधा असर पंजाब पर पड़ा।
1.3 सूरी एवं अफगान प्रभाव
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शेरशाह सूरी के काल में प्रशासकीय सुधार पंजाब में लागू हुए।
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लोधी शासकों की सत्ता के अंतिम समय में पंजाब राजनीतिक उथल-पुथल का केंद्र रहा।
इन ऐतिहासिक परिवर्तनों ने पंजाब की सामाजिक स्थिति को गहराई से प्रभावित किया।
2. धार्मिक जीवन और सामाजिक परिवर्तन
तुर्क–अफ़गान शासन के दौरान पंजाब में धार्मिक जीवन में सबसे बड़ा परिवर्तन इस्लाम का प्रसार था।
2.1 इस्लाम का प्रसार और सूफी सिलसिले
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सूफी संतों—चिश्ती, सुहरवर्दी, कादरी, नक्शबंदी—का पंजाब में आगमन हुआ।
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बाबा फ़रीद, बुल्ले शाह, शाह हुसैन जैसे सूफी संतों ने प्रेम, भक्ति और सहिष्णुता का संदेश दिया।
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इस्लाम का प्रसार मुख्यतः शांतिपूर्ण, सूफी विचारों के माध्यम से बढ़ा।
2.2 हिंदू धर्म की स्थिति
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भारतीय समाज की मूल संरचना—जाति व्यवस्था—पंजाब में बनी रही।
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ब्राह्मण धार्मिक कर्मकांड करते थे।
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कृषि प्रधान जातियाँ समाज में महत्वपूर्ण स्थान रखती थीं।
2.3 धर्मों का समन्वय (सिंक्रेटिक संस्कृति)
तुर्क–अफ़गान काल के दौरान पंजाब में
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सूफीवाद
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संत परंपरा
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भक्ति आंदोलन
के माध्यम से धर्मों में समन्वय देखने को मिला।
यह वही काल है जिसने आगे चलकर गुरु नानक देव जी जैसी विभूतियों के उदय का आधार तैयार किया।
3. सामाजिक संरचना
पंजाब की सामाजिक व्यवस्था विभिन्न जातियों, कबीलों, वर्गों और धार्मिक समुदायों से मिलकर बनी थी।
3.1 जाति और वर्ग व्यवस्था
हिंदू समाज:
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ब्राह्मण
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क्षत्रिय
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वैश्य
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शूद्र
साथ ही कृषि-आधारित समुदायों—जाट, अहीर, गुज्जर—का प्रभाव अत्यधिक था।
मुस्लिम समाज:
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अशरफ़ (उच्च वर्ग – तुर्क, अफ़गान, सैयद)
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अज्लाफ़ (स्थानीय धर्मांतरित)
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अरज़ल वर्ग (निम्न सामाजिक समूह)
3.2 ग्रामीण समाज की संरचना
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पंजाब की अधिकांश जनसंख्या गाँवों में रहती थी।
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जमींदारी प्रथा और रैयत प्रथा प्रचलित थीं।
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कृषि के आधार पर समाज में श्रम विभाजन स्पष्ट था।
3.3 महिलाओं की स्थिति
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मुस्लिम समाज में पर्दा प्रथा प्रचलित थी।
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हिंदू समाज में भी स्त्रियों की स्थिति सीमित थी।
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हालांकि कुछ कुलीन महिलाओं को शिक्षा और संपत्ति पर अधिकार प्राप्त था।
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सूफी परंपरा और भक्ति आंदोलन ने स्त्रियों की स्थिति को नैतिक-आध्यात्मिक सम्मान दिया।
4. आर्थिक और पेशागत जीवन
तुर्क–अफ़गान काल में पंजाब की अर्थव्यवस्था कृषि, व्यापार और शिल्प पर आधारित थी।
4.1 कृषक समाज
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पंजाब की उपजाऊ भूमि के कारण यहाँ कृषि मुख्य व्यवसाय था।
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गेहूं, जौ, बाजरा, कपास, गन्ना, सरसों प्रमुख फसलें थीं।
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तुर्क–अफ़गान शासकों ने सिंचाई पर भी ध्यान दिया।
4.2 नगर और व्यापार
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लाहौर, मुल्तान, सरहिंद और पठानकोट महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र थे।
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घोड़ों, कपड़ों, मसालों और धातुओं का व्यापार होता था।
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व्यापारिक करों का भार सामान्य जनता पर था।
4.3 शिल्प और हस्तकला
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कालीन, इत्र, आभूषण, लोहे का कार्य, लकड़ी की नक्काशी प्रचलित थी।
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तुर्क–अफ़गान कला ने स्थापत्य और शिल्प को नया आयाम दिया।
5. प्रशासनिक नीतियों का सामाजिक प्रभाव
तुर्क–अफ़गान शासन की नीतियाँ समाज पर सीधा प्रभाव डालती थीं।
5.1 भूमि राजस्व व्यवस्था
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इक्तादारी प्रणाली लागू की गई।
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कर वसूली में कठोरता के कारण किसानों पर आर्थिक दबाव बढ़ा।
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शेरशाह सूरी ने माप-तौल व जमीन सर्वेक्षण प्रणाली में सुधार किया।
5.2 कानून और न्याय व्यवस्था
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शरियत आधारित कानून मुस्लिम समाज पर लागू था।
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हिंदू समाज को अपने धार्मिक नियमों के अनुसार आंशिक स्वतंत्रता थी।
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दंड कठोर होते थे।
5.3 सैनिक प्रभाव
लगातार युद्धों के कारण
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समाज में असुरक्षा बढ़ी।
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कई क्षेत्रों में जनसंख्या विस्थापन हुआ।
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सैनिक वर्ग का प्रभाव बढ़ा।
6. कला, संस्कृति और साहित्य
तुर्क–अफ़गान काल में पंजाब की संस्कृति में कई नए तत्व जुड़े।
6.1 स्थापत्य कला
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मस्जिदें, मकबरों, मदरसों का निर्माण हुआ।
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लाहौर इस्लामी स्थापत्य का केंद्र बना।
6.2 सूफी संगीत और कविताएं
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कव्वाली, सूफी संगीत, समा की परंपरा मजबूत हुई।
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बाबा फ़रीद की वाणी आगे चलकर गुरु ग्रंथ साहिब में भी शामिल की गई।
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पंजाबी साहित्य ने नई ऊँचाइयाँ प्राप्त कीं।
6.3 भाषा और साहित्य
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फारसी प्रशासनिक भाषा बनी।
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पंजाबी लोकभाषा का प्रसार बढ़ा।
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संत-भक्ति एवं सूफी साहित्य फला-फूला।
7. सामाजिक समस्याएँ
तुर्क–अफ़गान शासन के दौरान पंजाब में कुछ गंभीर सामाजिक चुनौतियाँ भी मौजूद थीं।
7.1 धार्मिक असहिष्णुता के कुछ उदाहरण
हालाँकि कई शासक सहिष्णु थे, परंतु
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मंदिरों का विध्वंस
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जबरन धर्मांतरण के कुछ उदाहरण
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करों का बोझ
ने धार्मिक संघर्ष को जन्म दिया।
7.2 आर्थिक शोषण
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किसानों पर करों का भार बढ़ा।
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लगान, जज़िया और अन्य करों ने आम जनता को प्रभावित किया।
7.3 राजनीतिक अस्थिरता का प्रभाव
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युद्धों ने समाज में भय और असुरक्षा पैदा की।
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नगरों का आर्थिक जीवन प्रभावित हुआ।
निष्कर्ष
तुर्क–अफ़गान शासन के दौरान पंजाब की सामाजिक स्थिति बहुआयामी थी।
एक ओर—सूफीवाद, भक्ति आंदोलन, कला-संस्कृति का विकास, धर्मों का समन्वय और नगर-विकास—ने समाज को नई दिशा दी;
वहीं दूसरी ओर—युद्ध, कर-वसूली की कठोरता, जातीय विभाजन, और राजनीतिक अस्थिरता—ने आम जनता को प्रभावित किया।
इसके बावजूद, इस काल ने पंजाब में नई सांस्कृतिक धारा, सूफी विचारधारा, धर्मों के समन्वय और सामाजिक चिंतन की नींव रखी।
इसी परिवेश में आगे चलकर गुरु नानक देव जी का उदय हुआ, जिसने पंजाब की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना को नई परिभाषा दी।